126 साल पुराना ये चर्च कैसे अस्तित्व में आया? इसके पीछे की कहानी…

क्रिसमस नज़दीक है। इस मौक़े पर आप लोगों के सामने हम लेकर आए है उदयपुर के सबसे पुराने चर्च के अस्तित्व में आने की पूरी कहानी।

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आपको सीधा ले चलते है 126 साल पहले। ब्रिटिश इंडिया के समय उदयपुर रीज़न की मिशनरी डॉ शेफ़र्ड संभाल रहे थे। इनके शुरूआती 12 साल के दौरान क्रिस्चियन कम्युनिटी शहर में नई-नई रहना शुरू ही हुई थी। तब इनकी संख्या मुश्किल से 50 के करीब होगी। लेकिन इन लोगो के लिए कोई प्रार्थना स्थल नहीं होने से डॉ शेफ़र्ड ने एक चर्च बनवाने की इच्छा जताई। तब महाराणा फ़तेह सिंह जी ने क्रिस्चियन कम्युनिटी को ये ज़मीन 4 अगस्त, 1889 में तोहफ़े के तौर पर दी।

ये सब तब हो रहा जब भारत में ब्रिटिश रूल था। डॉ शेफ़र्ड के शुरूआती 12 सालों के दौरान क्रिस्चियन कम्युनिटी उदयपुर में बसना शुरू हो गई थी और करीब 50 के आसपास लोग रहने आ गए थे। मेवाड़ में मंदिर, मस्जिद और गुरुद्वारा तो पहले ही थे, डॉ शेफर्ड चाहते थे कि  एक चर्च भी बने जो न केवल प्रार्थना के लिए बल्कि सर्वधर्म सद्भाव को ध्यान में रखते हुए मेवाड़ का नाम करे। तब के स्टेट इंजिनियर थॉमस कैम्पबेल ने भी डॉ शेफ़र्ड की इस बात में अपनी दिलचस्पी दिखाई। आपको बता दे कि थॉमस कैम्पबेल वही है जिन्होंने फतेहसागर बाँध, विक्टोरिया मेमोरियल और चित्तौडगढ़ लाइन का निर्माण करवाया।

इस तरह ये चर्च 5 जुलाई, 1891 में पूरा बनकर तैयार हुआ। डॉ शेफ़र्ड के नाम पर इसका नाम शेफ़र्ड मेमोरियल चर्च पड़ा। ये बहुत विशाल तरीके से नहीं बनाया हुआ है फिर भी अपने आर्कीटेक्चर की वजह से एक अलग स्थान रखता है। इसका आर्कीटेक्चर आपको ब्रिटिश-काल की याद दिलाएगा।

इस चर्च में पहली प्रार्थना जॉन ट्रेल के द्वारा की गई थी जिसमें मेवाड़ के आम लोगों के साथ-साथ यहाँ के प्रबुद्ध लोगों ने भी हिस्सा लिया था, जिनमें महाराणा फ़तेह सिंह जी भी शामिल थे।

तब से लेकर आजतक ये चर्च उदयपुर में क्रिस्चियन कम्युनिटी के प्रार्थना का केंद्र बना हुआ है। आज की तारीख़ में हर रविवार करीब 1000 लोग प्रभु यीशु के सामने प्रार्थना करने आते है।

अभी यहाँ के पादरी रैमसों विक्टर है और इसके एडमिनिस्ट्रेशन का जिम्मा चर्च ऑफ़ नार्थ इंडिया(CNI) के पास है।

पिछले साल ही इसने अपने 125 वर्ष पुरे किए थे। 126 साल से ज्यादा पुराना होने के बावजूद आज भी पुरे राजस्थान में अपनी बनावट के लिए जाना जाता है। इसका आर्किटेक्चर और पत्थरों का चुनाव ब्रिटिश-काल के दिनों की याद ताज़ा करता है। इस चर्च को बनाने का मक़सद न सिर्फ किसी एक कम्युनिटी के लिए प्रार्थना स्थल बनाना था बल्कि मेवाड़ में धर्मो के बीच सामंजस्य स्थापित करना भी था। आज भी राजस्थान में कुल जनसँख्या के सिर्फ 1% लोग ही क्रिश्चियन समुदाय से है। लेकिन आज से 126 साल पहले  सिर्फ 50 लोगो की धार्मिक भावनाओं को ध्यान में रखते हुए चर्च का निर्माण करवाना एक मिसाल कायम करने जैसा था।

 

Content Courtesy: Mr. Bhupendra Singh Auwa

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