गवरी (Gavri) – मेवाड़ का पारंपरिक डांस थिएटर फॉर्म

राजस्थान न सिर्फ अपने कल्चर और रजवाड़ो के लिए बल्कि फोक म्यूजिक और फोक डांस के लिए भी जाना जाता है। इन्ही में से एक है मेवाड़ का ‘गवरी’ नृत्य। हालाँकि इस पर हुई रिसर्च के बाद ये साफ़ हुआ है कि ये सिर्फ नृत्य में नहीं है दरअसल गवरी एक म्यूजिकल ड्रामा है जो मेवाड़ में भील कम्युनिटी कई सौ सालों से इस परंपरा को निभाती आ रही है।

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photo credit : Traditional Indian Music

गवरी शब्द माँ गौरी से निकला है। गौरी माँ यानी माँ पार्वती जिसे भील जनजाति देवी गौरजा नाम से पुकारते है, उनके अनुसार श्रवण मास की पूर्णिमा के एक दिन बाद देवी गौरजा धरती पर आती है और धरती पुत्रों को आशीर्वाद देकर जाती है। इसी ख़ुशी में ये लोग गवरी खेलते है।

भीलों में एक कहानी बड़ी चर्चित है। कहानी के अनुसार भगवान् शिव से सृष्टि निर्माण हुआ है। पृथ्वी पर पहला पेड़ बरगद का था जो कि पातळ से लाया गया था। इस बरगद के पेड़ को देवी अम्बाव और उसकी सहेलियां लेकर आई थी और इन्होने उदयपुर के हल्दीघाटी के पास स्थित गाँव ‘ऊनवास’ में स्थापित किया जो आज भी मौजूद है।

राजस्थानी भाषा में ऐसे नुक्कड़ पर गानों के साथ किए जाने वाले नाटक को ख्याल कहा जाता है। ख्याल एक तरह की नाटक शैली है जैसे जयपुर में तमाशा है। गवरी भी ख्याल ही है।

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photo credit : Pramod Soni

कैसे शुरू होती है गवरी

भील लोग गौरजा माता के देवरे जाकर पाती(पत्ते) मंगाते है। ‘पाती मांगना’ मतलब गवरी खेलने की इजाज़त मांगना होता है। पाती मांगना एक परंपरा है जिसमे देवी की पूजा की जाती है उसके बाद उनसे गवरी खेलन के लिए पूछा जाता है। देवरे में मौजूद भोपा में जब माताजी प्रकट होती है तो उनसे गवरी खेलने की इजाज़त मांगी जाती तब जाकर गवरी खेलना शुरू होता है।

ये खेल नहीं आसां बस इतना समझ लीजे –

ये भील लोग 40 दिनों तक अपने-अपने घरो से दूर रहते। इस दौरान ये लोग नहाते नहीं है, एक टाइम का खाना खाते है और हरी सब्जी, मांस-मदिरा से परहेज रखते। यहाँ तक की ये चप्पलों-जूतों को त्याग देते और नंगे पैर घूमते है। इनका ग्रुप हर उस गाँव में जाकर नाचता है जहाँ इन लोगो की बहन-बेटी ब्याही गयी होती है। इन 40 दिनों तक ये दुसरे लोगो के घर ही भोजन करते है। गवरी के बाद उसे न्योतने वाली बहन-बेटी उन्हें कपडे भेंट करती है जिसे ‘पहरावनी’ कहते है। एक ग्रुप में बच्चो से लेकर बड़ो तक कम से कम 40-50 कलाकार तक होते है। ये सभी कलाकार पुरुष होते है और इन्हें ‘खेल्ये’ कहा जाता है। एक गाँव हर तीसरे साल गवरी लेता है।

गवरी के अलग-अलग पात्र

‘बूढ़िया’ और ‘राईमाता’ – ये दो मुख्य पात्र होते है । बूढ़िया भगवान् शिव को कहते है और राईमाता माँ पार्वती। इसलिए दर्शक भी इन दोनों की पूजा करते है। गवरी का नायक बूढ़िया होता है जो भगवान् शिव और भस्मासुर का प्रतीक होता है जो हाथ में लकड़ी का बना खांडा, कमर में मोटे-मोटे घुंघरू की बनी पट्टी, जांघिया और चेहरे पर मुकौटा लिए होता है। ये बाकी पात्रो के विपरीत दिशा में घूम कर नृत्य करता है। राईमाता नाटक की नायिका होती है। चूँकि सभी कलाकार पुरुष होते है इसलिए राईमाता का किरदार भी एक पुरुष कलाकार ही निभाता है।

अन्य प्रमुख किरदारों में झामटिया और कुटकड़िया होते है ।

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photo credit : Fouzia Mirza

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photo credit : Fouzia Mirza

 

गवरी में खेले जाने वाले मुख्य खेल इस प्रकार है –

  • मीणा–बंजारा
  • हठिया
  • कालका
  • कान्हा-गूजरी
  • शंकरिया
  • दाणी जी
  • बाणीया
  • चप्ल्याचोर
  • देवी अम्बाव
  • कंजर
  • खेतुड़ी और
  • बादशाह की सवारी
  • एक ऐतेहासिक खेल भी होता है जिसे बीबी,बादशाह और महाराणा प्रताप नाम दिया गया ।

 

गड़ावण-वळावण

गवरी का समापन ‘गड़ावण-वळावण’ से होता है। ‘गड़ावण’ के दिन पार्वती माँ की मूर्ति बनाई जाती है और जिस दिन इसे विसर्जित करते है उस दिन को ‘वळावण’ कहते है। गड़ावण के दिन शाम में गवरी के कलाकार गाँव के कुम्हार के पास जाते है और उनसे मिट्टी के घोड़े पर बिराजी गौरजा माता की प्रतिमा बनवाते है। इस मूर्ति को फिर घाजे-बाजे के साथ देवरे ले जाया जाता है जहाँ रात भर गवरी खेली जाती है। अगले दिन गाँव के सभी जाति के लोग मिलकर गौरजा माता की यात्रा निकालते है। प्रतिमा को पानी का स्त्रोत देख कर वहाँ विसर्जित कर दिया जाता है। इसके बाद इन कलाकारों के लिए उनके रिश्तेदार कपड़े लाते है जिसे ‘पहरावनी’ कहा जाता है। विसर्जन के बाद लोगो को पेड़ो की रखवाली का सन्देश देने के लिए नाटक ‘बडलिया हिंदवा’ खेला जाता है इसके आलावा ‘भियावाड’ नाटक भी होता है।

और इस तरह लगातार 40 दिनों तक की जाने वाली गवरी का समापन होता है। इन 40 दिनों तक कलाकार पूरी तरह से अपने पात्र को समर्पित रहता है और उसके साथ न्याय करता है।

गवरी  के बारे में कुछ जानकारियों के लिए राजस्थान स्टडी ब्लॉग का शुक्रिया।

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