[Fictional Letter] Teachers Day Special : “आपने डैडी की इतनी हेल्प क्यों की ?”

प्यारी सुशीला कोठारी जी,

पहले मैं आपको अपना इंट्रोडक्शन दे दूँ. मेरा नाम रिषित है. मैं 6 साल का हूँ, सनबीम स्कूल में पढता हूँ और उदयपुर में रहता हूँ. ये चिट्ठी मैं आपको छिप कर लिख रहा हूँ और पता नहीं कि आपतक मेरे ये छोटे छोटे अक्षर पहुंचेगे भी कि नहीं. पर मैं लिख रहा हूँ क्योंकि मैंने मेरे डैडी को पहली बार रोते हुए देखा है. वो मम्मा से कुछ कह रहे थे और बार बार आपका नाम ले रहे थे.

मैं आपको नहीं जानता. पर डैडी के मुँह से आपका नाम सुनकर आपमें मेरी जिज्ञासा बढ़ना कोई नयी बात नहीं थी. पिछले तीन दिनों की मेरी मेहनत रंग लायी और मेरी फ्रेंड दिशा के पापा, जो मेरे डैडी के स्कूल टाइम से फ्रेंड भी है, ने मुझे आपके बारे में बताया.

अब, आपके बारे में सब कुछ जानने के बाद मैं आपसे मिलना चाहता हूँ. मैंने आपको नहीं देखा, फिर भी दिशा के पापा के मुँह से आपके बारे में सुनने के बाद आपका पिक्चर मेरी आँखों में है. मैंने आपका चेहरा बना लिया है,जिसमे चश्मे के भीतर से झांकती आपकी आँखे मुझे रोजी मिस जैसी लग रही है. रोजी मिस मेरी क्लास टीचर है,जो मुझे बहुत प्यार करती है. पर जानना चाहता हूँ कि आपने डैडी की इतनी हेल्प क्यों की?

दादी ने बताया कि जब डैडी मेरी एज के थे, तब उनके डैडी यानी मेरे दादू भगवान के पास चले गए. जितने टॉय मेरे पास है, उतने टॉय से डैडी कभी नहीं खेले. उन्होंने इतनी चोकलेट्स भी नहीं खायी. और मेरी फेवरेट आइसक्रीम तो टेस्ट भी नहीं की. दादू नहीं थे तो उनको ये सब कौन लाकर देता ? मैं समझता हूँ. पर फिर से आपसे पूछ रहा हूँ, आपने डैडी की इतनी हेल्प क्यों की? मेरी रोज़ी मिस तो मुझे सिर्फ टॉफी देती है पर आपने डैडी को खूब सारी प्यारी प्यारी टेक्स्ट बुक्स दी थी. क्या उसमे छोटा भीम और डोरेमोन के फोटो भी थे ?

आपने डैडी के साथ रहकर उन्हें पोएम्स लिखना भी सिखाया. सच कहूँ, तो इस बात से मैं आपसे खफा हूँ. मुझे उनकी पोएम्स समझ में ही नहीं आती. वो बहुत बड़ी जो होती है.  पर दिशा के पापा बता रहे थे कि आप मेरे डैडी को खूब सारे कम्पीटिशन में ले कर जाती थी और उस से डैडी बड़े बड़े प्राइज जीतकर लाते थे. मेरे ड्राइंग रूम में वो सारी ट्रोफी’ज अभी भी शोकेस में पड़ी हुई है. डैडी को जब इंग्लिश में ट्यूशन की ज़रूरत हुई तो आपने किसी अरोड़ा सर को बोलकर उनसे डैडी को फ्री में ट्यूशन पढाने को भी बोला. ओह गोड! मैं तो स्कूल में ही पढ़-पढ़ कर थक जाता हूँ. डैडी तो उसके बाद भी ट्यूशन पढ़ने जाते थे !

दिशा के पापा ने मुझे बताया कि आप डैडी का स्कूल में बहुत खयाल रखती थी, बिलकुल रोज़ी मिस के जैसे या शायद उस से भी ज्यादा. आपके कारण ही डैडी ने केमिस्ट्री नाम के किसी सब्जेक्ट में सबसे ज्यादा नम्बर पाए. ये सब्जेक्ट मेरे कोर्स में नही है और आप भी मेरे पास नहीं. अगर मेरे भी ये सब्जेक्ट होता तो आपके बिना मैं उसमे पास कैसे होता ? एक बार जब स्कूल प्रिंसिपल ने डैडी को क्लास से बाहर निकाल दिया था तो आप उनसे लड़ पड़ी थी आपने तब तक लंच नही लिया था,जब तक कि प्रिंसिपल ने डैडी को माफ नहीं किया था.

क्यों लड़ती थी आप सब से डैडी के लिए? क्यों आप उनके लिए नई नई बुक्स लेकर आती थी? क्यों आपने उनको इतना आगे बढ़ने के अवसर दिए? क्यों आपने उनको इतने प्राइज दिलवाए? प्रिंसिपल से लड़ दी ? इसका उत्तर दिशा के पापा ने नहीं दिया, बोले कि मैं बहुत छोटा हूँ, नहीं समझूंगा.

कल मैंने आपके लिए एक प्यारा सा टॉय गिफ्ट लिया है. वो मैं आपको देना चाहता हूँ. मुझे आपका अड्रेस नहीं पता, दिशा के पापा को भी नहीं पता, बस उन्होंने इतना बताया कि आप सेक्टर पांच में कहीं रहती है ! मेरे डैडी से मैं नहीं पूछना चाहता. वो फिर से रोने लगेंगे. आपको ये चिट्ठी मिले तो प्लीज़ मुझसे मेरे स्कूल में आकर मिलना. मुझे आपसे खूब बातें करनी है और आपको रोज़ी मिस से भी मिलवाना है. आप आएँगी ना !!

आपका,

रिषित

(पत्र काल्पनिक है)

पद्म भूषण श्री अनिल बोर्दिया नहीं रहे!

Anil Bordia

अपने घर के एक कमरे में एक साधारण सा ऑफिस… एक साधारण मेज, कुल जमा तीन लकड़ी की बिलकुल साधारण कुर्सियां, जिसमे से एक पर अपनी रीढ़ को बिलकुल सीधा किये हुए बैठा एक बुज़ुर्ग, जो रिटायर्ड तो लगता था किन्तु “टायर्ड” बिलकुल नहीं…. सामने की दिवार पर एक नोटिस बोर्ड, वैसा ही एक बोर्ड उस बुज़ुर्ग के पीछे. पास के “आलिये” में बेतरतीब पड़े ढेर सारे कागज़- फोल्डर..”

कुछ ऐसा ही पहला और आखिरी परिचय हुआ था मेरा उस इंसान से. “कैसे है मनु जी, कैसे आना हुआ ?” इतना गंभीर होकर बोले थे कि मेरे आत्म-विश्वास ने तो उस वक़्त जवाब ही दे दिया था. उस वक़्त सम्मुख थे भारत सरकार के पूर्व केन्द्रीय शिक्षा सचिव, शैक्षिक चिन्तक, मेवाड़ के प्रसिद्द शिक्षाविद पद्मभूषण श्री अनिल बोर्दिया. इतना उच्चकोटि का व्यक्तित्व कि अच्छे से अच्छा पत्रकार उनके सामने एक बार तो “हिल” जाये. किन्तु वे थे इतने साधारण इंसान कि एक साधारण फिल्ड कार्यकर्ता के साथ दरी पर बैठकर किसी परियोजना की बारीकियां डिस्कस करते थे.

“ ना थाम सके हाथ, ना ही पकड़ सके दामन,

बड़े करीब से उठ कर चला गया कोई…”

आज वे ही श्री अनिल बोर्दिया नहीं रहे. उम्मीद की आखिरी डोर भी टूट गयी. कल रात्रि  11.00 बजे आपने आखिरी साँस ली. इस खबर से शहर में शोक की लहर फ़ैल गयी. कल प्रातः 08 बजे उनका अंतिम संस्कार आदर्श नगर श्मशान गृह में होगा.

स्वर्गीय श्री अनिल बोर्दिया का शिक्षा के क्षैत्र में, विशेषकर वैकल्पिक शिक्षा के क्षैत्र में बहुत योगदान रहा. राजस्थान सरकार की “लोक जुम्बिश परियोजना“ स्व. बोर्दिया की ही देन रही. बोर्दिया जी का जाना हर एक उस व्यक्ति की निजी क्षति है, जिसने कहीं ना कहीं उनके महान जीवन में उनकी एक झलक भी पायी हो. श्री बोर्दिया जीवनभर हर उस अंतिम व्यक्ति तक शिक्षा को पहुँचाने की कोशिशे करते रहे, जो शिक्षा से दूर था. केन्द्रीय शिक्षा सचिव रहते हुए भी वे युवाओं हेतु अनौपचारिक शिक्षा पर काफी ध्यान देते थे. सचिवालय में उनके सानिध्य में काम करने वालों में एक श्री बी. एल. पालीवाल उन दिनों को याद करते हुए बताते है कि उन्होंने बोर्दिया जी जैसा “इजी गोइंग” पर्सन नहीं देखा. पालीवाल का यहाँ तक मानना है कि यदि राजस्थान में शिक्षा का स्तर उपर उठा है, आंकड़े बदले है,तो इसका 100% श्रेय बोर्दिया जी को जाता है.

राजसमन्द जिले के स्वयंसेवी सहायता समूह जतन के निदेशक डॉ. कैलाश बृजवासी लोक जुम्बिश परियोजना के दिनों को याद करते हुए कहते है कि उस प्रोजेक्ट में उनके द्वारा तैयार किये गए कार्यकर्ता आज भी शिक्षा के क्षेत्र में अपनी पहचान सर्वथा अलहदा बनाये हुए है और उनके सपनो को साकार करने में लगे हुए है. अपना काम स्वयं करना और किये कार्य में पारदर्शिता रखना, ये दो गाँधीवादी सूत्र बोर्दिया जी ने तमाम उम्र अपनाये रखे. डॉ. बृजवासी का मानना है कि बोर्दिया जी के जाने से लगता है जैसे पूरे शिक्षा जगत के ऊपर से सहारा ही उठ गया हो.  कुछ ऐसे ही विचार “आस्था” की संस्थापक सदस्या अनीता माथुर और आस्था के ही अश्विनी पालीवाल भी रखते है. हमसे बात करते वक़्त बहुत भावुक होते हुए अनीता जी ने बताया कि राजस्थान की ग्रामीण महिलाओं की शिक्षा एवं सशक्तिकरण पर बोर्दिया जी के काम को कौन भुला सकता है. अश्विनी जी का कहना है कि शिक्षा में “नवाचार” की परिभाषा बोर्दिया जी के हाथो ही लिखी गयी. बोर्दिया जी द्वारा शुरू की गयी परियोजनाएं संभवतया पहली ऐसी परियोजनाएं थी, जिन्होंने ग्रामीण और आदिवासी बच्चों को पहली बार शिक्षा से रु-ब-रु करवाया. आदिवासी बाहुल्य कोटडा में उनके साथ काम करने के अपने अनुभव को शेयर करते हुए अश्विनी जी याद करते है कि बोर्दिया जी स्वयं मगरो (पहाड़ियों) पर जाकर बकरी चराने वाले बच्चों, खेतों में काम कर रहे बच्चो- किशोरों को पकड़ पकड़ कर शिक्षा संकुलों तक ले आते थे. कोटडा में पहली बार उन्होंने ही आदिवासी बालिकाओं के लिए आवासीय शिविर का भी आयोजन किया.

प्रसिद्द शिक्षाविद श्री शिव रतन थानवी का कहना है कि बोर्दिया साहब कोचिंग संस्थानों के बहुत खिलाफ थे. वे कोचिंग को शिक्षा का अंग ही नहीं मानते थे.

साथ काम करने वाले बहुत से शिक्षाकर्मी मानते है कि अनिल जी बोर्दिया काम को लेकर बहुत स्पष्ट थे, कार्य क्रियान्वन में उनका रवैया कभी कभी थोड़ा कठोर हो जाता था. फिर भी फिल्ड में काम करने वाले एक साधारण कार्यकर्ता से लेकर ऊँचा से ऊँचा अफसर भी उनके साथ अपनी बात एक जाजम पर बैठकर आसानी से कह देता था. और वे भी उसी आसानी से परियोजनाओं की बारीकियां समझने में व्यस्त हो जाते थे.

“ अनिल जी सर ने एज्युकेशन की धारा को ही बदल दिया. उनके निर्देशन में शुरू हुआ “शिक्षा- कर्मी” प्रोजेक्ट हो, “लोक जुम्बिश” हो या “दूसरा दशक”, हर परियोजना में वे “इनोवेशन” करने वाले योवाओं को आगे लाने में हमेशा तत्पर रहे.” ये कहना था ICICI फाउन्डेशन के प्रोजेक्ट ऑफिसर अरविन्द जी शर्मा का. वे याद करते हुए बताते है कि एक बार किसी कार्यशाला में एक गीत मंडली अपना गीत सुना रही थी और वहाँ उपस्थित 250 युवा उनके सुर में सुर मिला रहे थे. किसी एक पंक्ति पर युवाओं का सुर मण्डली के सुर के साथ फिट  नहीं बैठ रहा था. तब अनिल जी सर ने उस पंक्ति को तब तक युवाओं से दोहराने के लिए कहा, जब तक कि सही सुर ना पकड़ लिया जाये. ऐसी उनकी “परफेक्शन” वाली भावना थी. वे हर काम में परफेक्ट परफेक्शन चाहते थे. अपने अंतिम समय तक वे स्वयं को जवान फील करवाते थे.उनके जाने से लगता है, जैसे एक युगदृष्टा चला गया..

राजस्थान में शिक्षा के प्रचार प्रसार हेतु अपनी तमाम उम्र गुजरने वाले महान शिक्षाविद पद्मभूषण अनिल जी बोर्दिया के निधन पर उदयपुर ब्लॉग विनम्र भाव से शोक प्रकट करता है एवं परम पिता परमेश्वर से अनुनय करता है कि पवित्र आत्मा को शांति प्रदान करें एवं परिवार को इस दुःख की घडी में संबल प्रदान करें.

“धीरे धीरे हारी दुनिया, धीरे धीरे जीते लोग “

“उनका जाना पूरे राजस्थान के लिए एक अपूरणीय क्षति है. मैं उनका व्यक्तिगत प्रशंसक था. उनके जैसा ना पहले कोई था, ना ही शायद बाद में कोई आये” श्री गुलाबचंद कटारिया, विधायक, उदयपुर शहर

कोटडा में मेरी उनसे पहली मुलाकात हुई थी. तब से मैं उनका अनुचर बन गया. प्रभु उनकी आत्मा को शांति प्रदान करें. वे आखिरी साँस तक गरीब को उसका मौलिक हक दिलवाने में लगे रहे.”श्री रघुवीर सिंह मीणा, सांसद, उदयपुर

“उनके जैसा व्यक्तित्व खोजे नहीं मिलता. अपनी तमाम उम्र शिक्षा को हर वर्ग तक पहुँचाने में लगा दी बोर्दिया साहब ने”- श्री रियाज़ तहसीन, विद्या भवन सोसायटी, उदयपुर.

“ ड्रॉप आउट किशोर- किशोरियों के लिए शुरू की गयी दूसरा दशक परियोजना के अध्यक्ष रहे सर अपने आखिरी समय तक हर एक प्रोजेक्ट में व्यक्तिगत रूचि लेते रहे. निधन के कुछ दिन पूर्व माउंट आबू में दूसरा दशक की कार्यशाला में भी फोन करके रोज प्रगति की जानकारी लेते रहते थे. उनके जाने से मुझे व्यक्तिगत क्षति हुई है.”श्री कमल जैन, दूसरा दशक, जयपुर

“अनिल जी नहीं रहे, मुझे नहीं लगता. वे हमेशा जिन्दा रहेंगे हमारे बीच..“ राजेश टंडन, प्रिया- नई दिल्ली

“हर Complicated Problem का easyway solution उनके पास हर समय मौजूद रहता था. जब वे केन्द्रीय सचिव थे तब उनके सानिध्य में 1.5 साल रहने का मौका मिला. आज भी उनके साथ बिताया एक एक पल याद है. उनका जाना राजस्थान के लिए एक अपूरणीय क्षति है.”डॉ. बी.एल. पालीवाल, उदयपुर

“ मुझे लोकजुम्बिश में लाने वाले बोर्दिया जी ही थे. आज अगर मैंने जीवन में कुछ सिखा है तो उसका समस्त श्रेय केवल और केवल उन्ही को जाता है. लोगों से किस प्रकार सहभागिता को जोड़ा जाये, ये उनसे सिखा. वे रिटायर होने के बाद और ज्यादा एक्टिव हो गए थे. शिक्षा को जन जन का मुद्दा बनाने वाले अनिल जी बोर्दिया का यूँ रुखसत होना अपने आप में देश के लिए बहुत बड़ी क्षति है, जिसकी भरपाई मुश्किल है.”डॉ. कैलाश बृजवासी, जतन संस्थान, राजसमन्द

I join with so many others who knew Anil Bhai in offering our deepest sympathy on his passing. A visionary, a real loss … but what a legacy he has left behind. He was one of the famous educationists in the world. He initiated women’s empowerment work and made the important contribution to the development of women in the state. A life lived to the full and inspirational to others. I salute to him for his wonderful work.Anita Mathur, Co-Founder Astha Sansthan, Udaipur

“मेरे आंसू नहीं थम रहे. मुझे लगता है जैसे शिक्षा का सर्वेसर्वा ही चला गया. ईश्वर उनकी पवित्र आत्मा को शांति प्रदान करें”ममता जेटली, विविधा, जयपुर

“हम उन्हें बहुत मिस करेंगे. युवाओं की शिक्षा के लिए उनके द्वारा किये गए काम को कौन भूला सकता है. उनके जैसा कमिटेड इंसान मैंने अपनी जिंदगी में दूसरा नहीं देखा.सुनीता धर, जागोरी , नई दिल्ली

“वो जीवन भर गरीब आदमी को शिक्षित करने में लगे रहे. उनके जाने से समाज के उस निर्धन अंतिम व्यक्ति को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है. शिक्षा के लिए सरकार के साथ NGOs  को जोड़ने की अभूतपूर्व पहल आपही कर सकते थे.”अश्विनी पालीवाल, आस्था, उदयपुर

मैं उनका इस तरह से आकस्मिक जाना सहन नहीं कर पा रही. वे जहाँ भी रहेंगे, सदा हमें प्रेरणा देते रहेंगे- शबनम खलीज, पूर्व स्टेट डाइरेक्टर, लोक जुम्बिश “एक ऐसा भागीरथ धरती से रुखसत हो गया, जिसने अपने सतत परिश्रम से पूरी धारा को ही मार्ग बदलने पर मजबूर कर दिया था.अरविन्द जी शर्मा (ICICI फाउन्डेशन)

आज कारगिल विजय दिवस है

आज 26 जुलाई है. कारगिल विजय दिवस. जब बर्फ और सर्दी की आड़ में भारत के अभिन्न अंग कश्मीर के बड़े हिस्से में पाकिस्तानी सेना ने अपना अवैध कब्ज़ा जमा लिया, आज ही के दिन भारतीय सेना के जाबांज जवानो ने उसे मुक्त करवाया.

अपनी घुमक्कड प्रवृति के चलते अब तक दो बार लद्दाख हो आया हूँ. जब भी वहाँ जाता हूँ तो द्रास-कारगिल से गुज़रना होता है. हर बार वहाँ सिर पहले झुकता है, उन शहीदों की याद में, जिन्होंने दुश्मनों को नाको चने चबवा दिए…. और फिर तत्काल सिर गर्व से उठ जाता है, सीना चौड़ा हो जाता है, एक भारतीय होने के फख्र से.. अपनी सेना की बहादुरी पर…

चलिए आज आपको कारगिल विजय दिवस पर ले चलता हूँ.. धरती के स्वर्ग कश्मीर की गोद में बसे द्रास शहर और वहाँ स्थित कारगिल वार मेमोरियल के दर्शन करने…

kargil 1
द्रास शहर. श्रीनगर और कारगिल के बीच बसा कस्बा. इसे दुनिया का दूसरा सबसे ठंडा रिहाइशी इलाका होने का गर्व प्राप्त है. श्रीनगर से बालटाल, सोनमर्ग होते हुए जोजिला दर्रा पार करके यहाँ पहुंचा जा सकता है. जब आप यहाँ से गुजर रहे होते है तो नियंत्रण रेखा के सबसे करीब होते है. (जी हाँ, बिलकुल सही समझा आपने, आप यहाँ पाकिस्तानी तोपों की रेंज में होते है.)

फोटो में लेखक आर्य मनु (दायें) अपने मित्र आशीष विरमानी (दिल्ली) के साथ.

कारगिल वार मेमोरियल का मुख्य द्वार. वैसे यह युद्ध मूलतः द्रास में लड़ा गया,किन्तु इसे नाम मिला कारगिल युद्ध. द्रास कस्बा कारगिल जिले में आता है. यह स्थान द्रास कस्बे से लगभग सात किमी दूर  NH 01A पर स्थित है. वार मेमोरियल स्थल तोलोलिंग की पहाड़ियों की तलहटी में बना है, जहाँ युद्ध के समय जवानो का बेस केम्प हुआ करता था. यहाँ से टाइगर हिल्स की कुल घुमावदार सड़क दुरी 28 kms है.

अमर जवान ज्योति. शहीदों को नमन. इस युद्ध को ऑपरेशन विजय का नाम दिया गया था. राष्ट्रीय ध्वज के साथ यहाँ युद्ध में शरीक होने वाली सेना की टुकडियों के ध्वज लहरा रहे है. यहाँ एक जवान हमेशा शहीदों के सम्मान में सावधान की मुद्रा में खड़ा रहता है.

युद्ध शहीदों के नाम यहाँ सुनहरे अक्षरों में लिखे है. जाट रेजिमेंट, राजपुताना राइफल्स का नाम सबसे पहले देखकर हर किसी राजस्थानी का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है. पंजाब रेजिमेंट, गोरखा राइफल्स, बिहार, सिख, लद्दाख की रेजिमेंटो ने भी अपने सपूत खोये. अमर वाक्य लिखा है यहाँ…
“शहीदों की चिताओं पर, लगेंगे हर बरस मेले,

वतन पर मिटने वालो का, यही बाकी निशाँ होगा…”

म्यूजियम में रखे शहीदों के अस्थि कलश. ये उन शहीदों की अस्थियां है, जिन्हें पहचाना नहीं जा सका. पर ये वे है जो हमेशा के लिए अमर हो गए….सिर्फ हमारे लिए, ताकि हम आराम से यहाँ त्यौहार मना सके…. अगली बार जब इस दिवाली आप अपने घर सजा रहे हो, तो एक दीपक इन अनाम शहीदों के लिए ज़रूर लगाएं…

ये है, पाकिस्तानी सेना द्वारा बरसाए गए मोर्टारों और टॉप गोलों के अवशेष. ये सिर्फ मोर्टारों के पिछले हिस्से (टेल) है. आप सोचिये, ये मोर्टार कितने बड़े और तबाही मचाने वाले होंगे..!! उस पर हालात ये कि पाकिस्तानी सेना पहाड़ की छोटी से हमला कर रही थी, जबकि भारतीय जवान तलहटी से उन पर जवाबी कार्रवाही कर रहे थे.

फिर भी है किसी पाकिस्तानी गोले में इतना दम, जो भारत का बाल भी बांका कर पाए ?

युद्ध में तडातड चलती गोलियों और तनाव के माहौल में सैनिक ठिठोली के क्षण खोज ही लेते थे.मिसाइल को दागने से पहले कुछ इस तरह बयान किये अपने ख्याल, एक सैनिक ने…

आज हम यहाँ बैठ दिन भर टीवी पर उन दिनों की कवरेज देखेंगे, कल हुए नए राष्ट्रपति के शपथ ग्रहण समारोह को देखेंगे… सोचिये उन दिनों हाड कंपा देने वाली सर्दी में किस तरह उन जाबांजो ने देश की रक्षा करते हुए कैसे तनाव के क्षणों में समय बिताया होगा..!!!

उन दिनों महान कवि (स्वर्गीय )श्री हरिवंश राय बच्चन ने अपनी अमर कविता “अग्निपथ” की चंद पंक्तियाँ स्वयं लिखकर भारतीय सेना की हौंसला अफजाई की थी. उसी हस्तलिखित कविता को म्यूजियम में फ्रेम करवा के रखा गया है… ये पंक्तियाँ हमें आज भी लगातार आगे बढते रहने की प्रेरणा देती है.

 

All the Photos are Property of UdaipurBlog.com and may be used only with proper permission from the respective writer.

मेरे सपनो की बारिश, कब आओगी तुम ??

clouds in udaipur

वर्षा ऋतू हमें गहराई तक छूती है. सावन में सिर्फ तन ही नहीं भीगता, अंदर तक भिगो जाती है बरखा की बूंदें… सावन की रिम झिम फुहारों के बीच उगते अंकुरों, हरे होते पहाड़ों और, और ज्यादा गहराई तक नीली होती झीलों के बीच हमारा मन “किसी की चाह” हेतु व्याकुल हो उठता है.

पर इस बार चाह किसी और की नहीं, बल्कि बारिश की ही है. ये आये तो किसी और को याद करने का मौक़ा मिले ना ! हरियाली अमावस पर, सोचा कि शहर के कमीनेपन से दूर जब गांव के निर्मल मन फतहसागर और सहेलियों की बाड़ी आयेंगे तो इंद्र को मजबूर होना ही पड़ेगा… पर इस बार भी हमेशा की तरह मेरा अनुमान गलत निकला ! उनकी पुपाडी की आवाज़ मेघों तक नहीं पहुंची. उनका सजना सवरना व्यर्थ गया…!!

 

“सावन आयो रे, ओ जी म्हारा, परणी जोड़ी रा भरतार,

बलम प्यारा, सावन आयो रे…”

 

सावन तो आयो पण बरखा कोनी आई .. परणी जोड़ी का भरतार, अब तुझे कैसे पुकारें..!! कालिदास ने मेघदूत ग्रन्थ में अपना संदेसा पहुँचाने के लिए बादलों को जरिया बनाया था.. वे जाकर प्रेमिका पर बरसते थे.. यहाँ तो सबकुछ सूखा- सूखा… कैसे भीगेगा प्रेमिका का तन- मन… क्या जुगत बिठाये अब ??

बचपन के दिन याद आते है. मुझे बचपन में अपनी भुआजी के यहाँ गांव में रहने का खूब मौका मिला. बारिश में भीगते भीगते खूब जामुन खाते थे. पेड पर चढ़ने की भी ज़रूरत नहीं होती थी, खुद-ब-खुद जामुन बारिश की मार से ज़मीं पर आ गिरते थे. मक्की की बुवाई होती थी… गीली मूंगफली को खेतों की पाल पर ही सेक कर खाते थे. भुट्टे का मज़ा, मालपुए की ठसक…क्या क्या आनंद होते थे. कच्ची झोपडी के केलुओं से बारिश की झर झर गिरती धार… और उस पर गरमा गरम राब… भुआ तवे पर चिलडे बनाती थी..आटे का घोल जब गरम गरम तवे पर गिरता था तो एक सौंधी महक मन में बस जाती थी. गांव के लोग इकठ्ठा होकर एक जगह सामूहिक प्रसादी करते थे. तेग के तेग भरकर खीर बनती थी और बनती थी बाटियां … आज बस उनकी यादें शेष है. आज 260 रुपये किलो वाले मालपुए लाकर खा लेते है, और खुश हो लेते है.. पर उसमे माटी की वो सौंधी खुशबु नहीं होती.

खैर अब अपन शहर में रहते है. कार की खिडकी खोलकर बारिश में हाथ भिगोने का मज़ा हो या बाइक लेकर फतहसागर पर चक्कर लगाने का मौका… हमें सब चाहिए, पर निगोडी बारिश पता नहीं किस जनम का बदला ले रही है.. उमस ने जीना मुहाल कर रखा है. खाली फतहसागर पर मन नहीं लगता. पिछोला में देवास का पानी आने की क्षणिक खुशी हुई ही थी कि लो जी वहाँ भी चक्कर पड़ गया. अब तो बस श्रीनाथजी का ही आसरा है. क्योंकि बारिश नहीं हुई तो उनका नौका विहार कैसे होगा. लालन लालबाग कैसे जायेंगे, बंशी कैसे बजेगी, गायें क्या खायेगी…! हम तो जैसे जैसे दो दिन में एक बार आ रहे नल के पानी से काम चला लेंगे किन्तु अगर बारिश नहीं आई तो बेचारे ये निरीह पशु क्या खायेंगे ? गलती इंसान की और भुगते सारे जीव-जंतु..!!! मन बस बार बार अपने   को निर्दोष पाते हुए अपील कर रहा है …
काले मेघा काले मेघा, पानी तो बरसाओ….

Photo by : Mujtaba R.G.

Media steals credits of UdaipurBlog.com Pictures : ये तो हद ही हो गयी !!

stop stealing credits and photos
Image Credits: http://www.flickr.com/photos/samiksha

इसे कहते है, मेहनत करे कोई और “जनहित” के नाम पर उसका लाभ उठाये कोई ! कुछ ऐसा ही हुआ है हाल ही में “उदयपुर ब्लॉग”(UdaipurBlog.com) के साथ और करने वाले और कोई नहीं अपितु लोकतंत्र के चौथे स्तंभ “पत्रकारिता” के लोग, समाज जिनसे उम्मीद लगाये बैठा होता है कि वे “सच्चाई और साफगोई ” के साथ हर बात आम और खास तक पहुंचाएंगे, किन्तु यही प्रिंट मिडिया जब किसी और के कार्य को अपने “लाभ” हेतु प्रयोग में ले और वो भी इतनी चतुराई से कि कोई उन पर उंगुली नहीं उठा सके.

दरअसल मामला हाई-प्रोफाइल शख्सियत से जुड़ा है. हाल ही में अभिनेता रणबीर कपूर उदयपुर आये. शहर में अलग अलग जगह अभिनेत्री दीपिका पादुकोण के साथ शूटिंग की और अपनी आदत से मजबूर होकर सभी जगह “धुएं के छल्ले भी उडाये…” उदयपुर ब्लॉग के छायाकार श्री मुज्तबा आरजी ने गणगौर घाट पर उनके इस कृत्य को कैमरे में कैद किया. उदयपुर ब्लॉग ने उन तस्वीरों को मई 28 को अपने फेसबुक पेज(Facebook.com/UdaipurBlog) पर डाला और लो जी हो गया बवाल !

अगले ही दिन ये मामला सुर्ख़ियों में आ गया, 31 मई को एक प्रमुख समाचार पत्र ने खबर प्रकाशित कर दी और जब कल उदयपुर सेशन कोर्ट ने जमानती वारंट जारी किया तो सभी समाचार पत्रों ने 2 जून को खबर छाप दी.

खबर प्रकाशित की तो साथ में सबूत के तौर पर फोटो तो चाहिए था ही, अब किसी के पास फोटो था नहीं तो उदयपुर ब्लॉग के आर्टिकल से या यूबी के ही फेसबुक पेज से फोटो को “कॉपी” किया गया. बहुत सफाई से फोटो पर लगे “वाटर मार्क” जिसमे यूबी(UB – UdaipurBlog.com) का नाम लिखा था, उसे “फोटोशोप” में जाकर हटाया गया और खबर के साथ आज के अखबार में छाप दिया. ये किसी एक समाचार पत्र ने नहीं किया अपितु लगभग सभी प्रमुख समाचार पत्र इस भेडचाल में शामिल रहे.

 

अगर आपको विश्वास नहीं हो रहा तो पहले देखिये असल फोटो जिस पर उदयपुर ब्लॉग का वाटरमार्क लगा है और रणबीर कपूर सिगरेट पीते दिखाई दे रहे है:

UdaipurBlog album Picture

 

अब देखिये अख़बारों में छपी खबर और उस के साथ छपे फोटो को … :

Dainik Bhaskar 30 June, 2012 Copied Picture

 

Bhaskar Calling it as their Impact - 2June, 2012 Newspaper

 

Rajasthan Patrika Newscutting (Last Page) - 2 June, 2012

 

Pratahkal Newscutting (First Page) - 2 June, 2012 - calling it - "SABSE PEHLE PRATAHKAL"

 

स्थानीय समाचार पत्रों का तो ठीक, मुंबई के सांध्य दैनिक “मिड डे” ने भी उदयपुर ब्लॉग के फेसबुक पेज से सभी फोटोग्राफ्स को कॉपी किया और उन पर से वाटरमार्क हटाकर उन्हें अपने वेबसाईट पर प्रकाशित कर दिया,बिना क्रेडिट दिए. यहाँ तक भी ठीक था, एनडीटीवी ने मिड डे के हवाले से उन फोटोग्राफ्स को उठाकर अपनी वेब पर प्रकाशित कर दिया. और उसका क्रेडिट मिड डे(Mid-Day.com) को डे दिया. मतलब जिसने असली मेहनत की, उसका कही नाम नहीं… खुल्लम खुला चोरी नहीं कहेंगे तो क्या कहेंगे इसे..???

ये रही मिड डे और एनडीटीवी की खबर, जिसमे एक (मिड डे) फोटो को “क्रॉप”(Crop) करके छाप रहा है तो दूसरा बिना पड़ताल किये उन फोटो के लिए मिड डे को ही क्रेडिट डे रहा है.

Mid Day Newspaper - page 32 - Photo
Online Newspaper Cutting of Mid-Day newspaper
  • Mid-Day.com : Article (Where they copied the image bluntly by cropping the watermark)
  • NDTV.com: Article(Where they gave the image credits to : Mid-Day.com)

 

अब देखिये असली फोटो, जिन पर यूबी का वाटरमार्क लगा हुआ है:

UdaipurBlog.com Real Photo

 

UdaipurBlog.com Real Photo

 

UdaipurBlog.com Real Photo

 

UdaipurBlog.com Page : Album Link

 

इस बारे में जब मिड डे की सह संपादक जान्हवी सामंत से बात की तो उन्होंने सफेद झूठ बोलते हुए हमें कहा कि उन्होंने तो ये फोटो एक अन्य वेबसाईट “पिंक विला”(PinkVilla.com) से उठाये है, और वहाँ कोई वाटरमार्क नहीं था. जब उनसे हमने  सम्बंधित वेबसाईट पिंक विला के उस पृष्ठ का यूआरएल माँगा तो उन्होंने मेल करने को कहा, किन्तु बाद में कोई मेल किया ही नहीं, हमने अपने स्तर पर पड़ताल की तो पाया कि उपरोक्त साईट पर हमारे फोटो थे ज़रूर,किन्तु वाटरमार्क के साथ(माने पिंक विला की गलती नहीं.. उसने तो उदयपुर ब्लॉग को पूरा पूरा क्रेडिट दिया) – (PINKVILLA.com : Article Link) हमारे पास जान्हवी सामंत का वो मेल भी मौजूद है, जिसमे उन्होंने साफ़ साफ़ कहा है कि फोटो को एडिट करने में या यूबी का वाटरमार्क हटाने में मिड डे का कोई हाथ नहीं,जबकि हकीकत कुछ और ही है.

 

उदयपुर ब्लॉग को कोई आपत्ति नहीं होती यदि ये समाचार पत्र समूह इन फोटो के लिए यूबी को आभार प्रकट कर देते. यदि इन अख़बारों की तरफ से मांग की जाती तो यूबी मूल फोटो इनको उपलब्ध करवा देता. किन्तु इस तरह एडिटिंग द्वारा वाटर मार्क हटाकर फोटो को अखबार में/ वेबसाईट पर प्रकाशित करना क्या “सर्वाधिकारों” का हनन नहीं ? क्या इसे कोपी राईट एक्ट का उल्लंघन नहीं कहेंगे ?

अब यूबी(UdaipurBlog) अपने 19 हज़ार से अधिक सदस्य पाठकों तथा अन्य विजिटर्स पाठकों से जानना चाहता है कि आगे क्या एक्शन लेना चाहिए…! आपकी राय के अनुसार ही हम सोच समझकर “कॉपी राईट” नियमों के खिलाफ किये गए इस कृत्य हेतु एक्शन लेंगे. उदयपुर ब्लॉग(UdaipurBlog.com) इस हेतु अपने सभी अधिकार सुरक्षित रखता है. इस लेख के द्वारा पुनः सम्बंधित समाचार पत्र समूहों से उनका पक्ष रखने की अपील उदयपुर ब्लॉग करता है. अन्यथा इस खबर पर आगे भी लगातार लेख प्रकाशित किये जाने की सम्भावना से यूबी इनकार नहीं करता.  यह तो हम हे जो आवाज़ उठा रहे हे नजाने कितने लोगो के साथ ऐसा किया होगा इन मीडिया वालो ने..!!

———————————-

डीस्क्लिमेयर (Disclaimer): जून 02, 2012 को ही हमने इस खबर को यूबी पर प्रकाशित करना चाहा, किन्तु पत्रकारिता के साधारण  नियमों के अनुसार किसी भी संगठन के खिलाफ या उनके कार्य विशेष के खिलाफ कोई विषयवस्तु प्रकाशित करने से पूर्व उन्हें पूर्वालोकन हेतु  प्रस्तुत करना आवश्यक होता है.इसी सन्दर्भ में  इस लेख को प्रकाशन से पूर्व सभी सम्बंधित समाचार पत्र समूहों को प्रूफ के साथ  भेजा गया और उनसे आपत्तियां आमंत्रित करनी चाही और उनका पक्ष जानना चाहा. इस सन्दर्भ में सभी को शनिवार  दिनाक 2 जून को प्रथम बार एवं सोमवार 4 जून को द्वितीय बार मेल किया गया. आपत्ति प्रस्तुत करने का अंतिम समय पहले शनिवार शाम को रखा गया किन्तु साप्ताहिक अवकाश के चलते बढाकर सोमवार शाम आठ बजे तक किया गया.

मिड डे की तरफ से सोमवार दोपहर में मेल एवं फोन द्वारा “माफ़ी नामा” आया किन्तु उसमे उन्होंने अपनी गलती ” पिंक विला” पर थोपनी चाही जो प्रथम दृष्टया सफ़ेद झूठ है. उस मेल को हू-ब-हू यहाँ प्रकाशित कर रहे है… इसके अतिरिक्त “देश का नंबर एक अखबार” होने का दंभ भरने वालो से लेकर “राजस्थान की माटी” से जुड़ा होने का दावा करने वाले पुराने अखबार और यहाँ तक कि उदयपुर के ही सूरजपोल से प्रकाशित होने वाले एक अन्य अखबार (जिसने इस फोटो को हर खबर के साथ छापा और दावा किया कि खबर भी सबसे पहले उसी ने प्रस्तुत की है) ने अपनी तरफ से कोई प्रतिक्रिया या पक्ष रखने की ज़रूरत ही नहीं समझी, जबकि उन्हें कई बार फोन किया गया अथवा मेल किया गया.

मिड डे द्वारा प्रस्तुत क्षमा पत्र :

Email Copy of : Janhavi.Samant (Mid Day , Editor)

(यद्यपि हम इस से सहमत नहीं है क्योंकि इसमें संपादक महोदया सफ़ेद झूठ बोल रही है, फिर भी मिड डे समाचार पत्र के अधिकारों की रक्षा करते हुए उनका पक्ष प्रस्तुत है)

For any queries, solutions – you can reach us on : info@udaipurblog.com

मेवाड़ के प्रमुख शक्तिपीठ – The Major Temples of Mewar

“जगदम्बा थे तो ओढ़ बताओ रे , महारानी थे तो  ओढ़ बताओ रे..
क’शिक लागे, तारा री चुनडी..”

Neemuch Mata Ji Mandir in Udaipur

सुबह सुबह उनींदी आँखों से उठा तो दादी सा’ मंदिर में पूजा करती हुई ऐसा ही कुछ भजन गुनगुना रही थी. पूछा तो आँखें तरेर कर बोली, “वेंडा छोरा, आज माताजी रो दन है. नवो संवत भी है, बेघो उठ जा. आज देर तक सुतो रह्यो तो पूरा साल सुतो ही’ज रेवेला.” अरे हाँ, आज तो नव संवत्सर है. कल ही तो कोर्ट चौराहे पर आलोक स्कूल के बच्चो ने मेरी बाइक रोक कर मुझे रोली-तिलक लगाया था,मैं भूल कैसे गया. आज तो दूध तलाई पर आतिशबाजी होगी. स्वागत होगा नव संवत्सर का.

सबसे पहले तो उदयपुर ब्लॉग के सभी देसी-विदेसी पाठकों को नवसंवत्सर 2069 और चैती नौरतों की बहुत बहुत बधाई. हमारे सिंधी भाइयों को चेटीचंड जी लाख लाख वधायुं. “आयो लाल, झूलेलाल “. आज मेरा मन बार बार कह रहा है कि आप सभी को उदयपुर में जहाँ जहाँ जोगमाया के देवरे है, मंदिर है..वहाँ ले चलूँ.. तो क्या ख्याल है आपका?

“झीना झीना घूघरा माता के मंदिर बाजे रे..
मोटा मोटा टोकरा भैरू के बाजे रे..”
Mahalaxmi Temple in Udaipur

तो साहब बैठो गाडी पर, सबसे पहले अम्बा माता चलते है. वाह जी वाह ! क्या मोटे तगड़े शेर बाहर पहरा दे रहे है. उदयपुर के दरबार यहाँ आज भी सबसे पहले पूजा करते है. महाराणा स्वरूपसिंह जी और भीम सिंह जी तो कई बार  घुटनों घुटनों तक के पानी को पार करके यहाँ दर्शन करने आते थे.

नीमच और खीमच माता. खीमच माता नीचे फतह सागर की पाल पर तो नीमच माता पास में ऊँचे पहाड पर. दोनों सगी  बहने है पर छोटी वाली नाराज़ होकर पहाड़ी उतरकर आ गयी. नव रात्र के आखिरी दिन दोनों मंदिरों के भोपाजी के “डील” में माताजी आती है. दोनों बहने मिलती है..खूब रोती  है. तो अपने कभी छोटी बहिन से झगडा हो जावे तो नाराज़ नी करना उसको.. आप बड़े हो, अपने सबर कर लेना.

बेदला चलते है. यहाँ के रावले की आराध्य “सुखदेवी माता जी” के दर्शन करते है. माताजी के इतने भगत है कि उदयपुर में पांच में से तीन  कार के पीछे “जय सुखदेवी माता जी” लिखा हुआ मिल जायेगा.  माताजी के मंदिर के सामने दो पत्थरों के बिच रास्ता बना हुआ है, कहते है, उस संकरे रास्ते से निकल जाओ तो कोई रोग आपको नहीं घेरेगा. विश्वास करो तो माताजी है, नही मानो तो..थारी मर्जी सा’

डबोक सीमेंट फेक्ट्री के पास पहाड़ी पर “धूनी माता” बिराज रही है. नौ दिन नौरते यहाँ आस पडोसी गाँव के “पटेलों” की खूब भीड़ रहती है.माताजी के दर्शन करो और साथ में इस पहाड़ी से सामने हवाई अड्डे पर उतरते हवाई जहाज को देखो.. अपन ऊपर और हवाई जहाज नीचे. यहाँ का हरियाली अमावस का मेला बहुत जाना माना  है. यहाँ से उदयपुर आते बखत बेड़वास में माता आशापुरा के दर्शन करना मत भूलना.

टीडी  के पास जावर माता बिराजी है. पास में जिंक की हजारो साल पुरानी खदाने है. कलकल नदी बह रही है. इस मंदिर को औरंगजेब ने खूब नुक्सान पहुचाया. फिर भी मंदिर में आज भी पुरानी मूर्तिकला देखने लायक है.माताजी का मुँह थोडा सा बायीं ओर झुका हुआ है. कारण, एक भगत ने सवा लाख फूल चढाने की मिन्नत मांगी और पूरी करने में कंजूसी दिखाई. माताजी ने नाराज होकर अपना मुँह झुका दिया.  भगत को कुछ नुक्सान नहीं पहुचाया. माँ तो माँ होती है.

अब चलते है चित्तोड की ओर. किले पर सभी को आशीर्वाद दे रही है माता कालका . जितना भव्य चित्तोड का किला, उतना ही भव्य माता का मंदिर. सामने तालाब. कहते है इस किले की रक्षा का सारा भार माताजी ने अपने ऊपर ले रखा है. यहाँ भी नौ दिन मन्नत मांगने और “तंत्र” पूजा करने वालो का सैलाब उमड़ता है. जोगमाया के दर्शन कर बहुत आत्मिक सुख मिलता है.
आते वक़्त सांवरिया जी के दर्शन करते हुए आवरी माता चलते है. कहते है माता आवरा राजपूत चौहान वंश में जन्मी. सात भाइयों की अकेली बहन. सातों भाइयों का इतना प्रेम कि सातों अलग अलग जगह अपनी बहन का रिश्ता कर आये. एक ही दिन, माता से ब्याहने सात सात बिंद गोडी चढ आये. तब माताजी में “जोत” जगी और उन्होंने वहीँ संथारा ले लिया. मेवाड़ के साथ साथ मालवा, वागड , मारवाड.. जाने कहाँ कहाँ से लकवा ग्रस्त रोगी यहाँ ठीक होने आते है. पूरे मंदिर में जहाँ जहाँ तक नज़र जाये, लकवा रोगी माँ के दरबार में बैठे मिलते है. यहाँ राजपूती रिवाज़ से माता की सेवा होती है.

Idana Mata Ji Mandir

कुराबड रावले के पास खुले चबूतरे पर इड़ाना माताजी स्थानक है.पीछे ढेर सारी त्रिशूल. यहाँ माताजी महीने में कम से कम दो बार अगन-स्नान लेती है. इसी अग्नि स्नान के कारण आज तक माँ का मंदिर नहीं बन पाया. ये शक्ति पीठ अन्य सभी से सर्वथा अलग, सर्वथा जुदा. कुराबड रावले के श्री लवकुमार सिंह जी कृष्णावत फिलहाल यहाँ का सारा प्रशासनिक कार्य संभाल रहे है.

अजी साहब, एक ही दिन में सब जगह दर्शन नहीं होंगे. आराम से एक एक दिन सब जगह दर्शन करने जाना. नौ दिन के नौ दर्शन आपको बता दिए. और समय मिले तो माछला मगर पर रोप वे में बैठकर करनी माता दर्शन  करने जरुर जाजो. अरे कभी तो अपनी जेब ढीली करो. बस साठ रुपये किराया है. उभयेश्वर का घाटा ध्यान से चढ़ते हुए महादेव जी के दर्शन करना और पास में ही “वैष्णो देवी” को भी धोक लगते आना. थोडा और समय मिले तो इसवाल से हल्दीघाटी मार्ग पर बडवासन माता का बहुत सुन्दर स्थान है. और समय मिले तो बांसवाडा में माता त्रिपुर सुंदरी, वल्लभ नगर में उन्ठाला माता, देबारी में घाटा वाली माता, भीलवाडा-बूंदी रोड पर जोगनिया माता, बेगूं में झांतला माता, झामेश्वर महादेव के पास पहाड़ी पर  काली  माता,जगत कस्बे में विराजी माताजी, आसपुर में आशापुरा माताजी.. नहीं थके हो तो भेरू जी के देवरे ले चालू.. आज तो वहाँ भी जवारे बोये गए है.
इन नौ दिन पूरी श्रृद्धा के साथ आप माताजी की पूजा करो, नहीं तो मेरी दादी सा’ को आपके घर का पता दे दू.. वो आपको सिखा देगी, पूजा कैसे होती है. उनका एक बहुत प्यारा भजन है, उसीके साथ आपसे विदाई…

“माता आयो आयो आवरा रानी रो साथ, आये ने वाघा उतरियो म्हारी माँ
माता हरे भरे देखियो हरियो बाग, फूला री लिदी वासना म्हारी माँ
माता फुलडा तो तोड्या पचास, कलिया तोड़ी डेढ सौ म्हारी माँ
माता फूलडा रो गुन्थ्यो चंदर हार, कलिया रा गुन्थ्या गजरा म्हारी माँ
माता कठे रलाऊ चंदर हार, कठे तो बांधू गजरा म्हारी माँ
माता हिवडे रालु चंदर हार, ऊँचा तो बांधू गजरा म्हारी माँ…”

आज दशामाता व्रत पूजन

होली के दसवे दिन राजस्थान और गुजरात प्रांत में दशामाता व्रत पूजा का विधान है. सौभाग्यवती महिलाएं ये व्रत अपने पति कि दीर्घ आयु के लिए रखती है. प्रातः जल्दी उठकर आटे से माता पूजन के लिए विभिन्न गहने  और विविध सामग्री बनायीं जाती है. पीपल वृक्ष की छाव में ये पूजा करने की रीत है. कच्चे सूत के साथ पीपल की परिक्रमा की जाती है. तत्पश्चात पीपल को चुनरी ओढाई जाती है. पीपल छाल को “स्वर्ण” समझकर घर लाया जाता है और तिजोरी में सुरक्षित रखा जाता है. महिलाएं समूह में बैठकर व्रत से सम्बंधित कहानिया कहती और सुनती है. दशामाता पूजन के पश्चात “पथवारी” पूजी जाती है. पथवारी पूजन घर के समृद्धि के लिए किया जाता है.
इस दिन नव-विवाहिताओं का श्रृंगार देखते ही बनता है. नव-विवाहिताओं के लिए इस दिन शादी का जोड़ा पहनना अनिवार्य माना गया है.
dasha-mata-udaipur
dasha-mata-udaipur
dasha-mata-udaipur
dasha-mata-udaipur
dasha-mata-udaipur

श्री श्री रवि शंकर जी : मिजाज़ से अलमस्त फकीर

Sri Sri Ravishankar Ji in Udaipur

“फलक बोला खुद के नूर का मैं आशिकाना हूँ..
ज़मीं बोली उन्ही जलवों का मैं भी आस्ताना हूँ..”

नमस्ते जी. आज की बात शुरू करने से पहले तक मुझे हज़ार हिचकियाँ आ चुकी है. इस ख़याल भर से कि आज मुझे इतनी बड़ी शख्सियत की बात करनी है,जिसे देखने को आसमान की तरफ देखना पड़ता है. हाँ जी हां, मैं श्री श्री की बात कर रहा हूँ. श्री श्री रविशंकर साहब की. अजी हुजूरं, हुज़ुरां, आपका हुक्म है, सो उसी को अता फरमा रहा हूँ. वर्ना इतने महान लोगों को याद फरमाने के लिए किसी तारीख के बंधन को मैं नहीं मानता. मगर मन ने न जाने कितनी बार कहा कि मियाँ ! दस मार्च को परवर दिगार झीलों के शहर, हमारे उदयपुर तशरीफ़ ला रहे हैं. सो उनका एहतराम तो करना है. सो लीजिए पेश-ए -खिदमत है.
सोचता हूँ,तो लगता है, हाय ! क्या चीज़ बनायीं है कुदरत ने. अपनी जिंदगी में इस कदर पुरखुलूस और शराफत से लबरेज कि हम जैसो को आप ही अपने गुनाह दिखाई देने लगे. श्री श्री कुछ बोलने को मुह खोले तो लगे घुप्प अँधेरे में चरागाँ हो गया. अकेलेपन का साथी मिल गया. भटकते भटकते रास्ता मिल गया. उदासी को खुशी और दर्द को जुबान मिल गयी. क्या क्या नहीं हुआ और क्या क्या नहीं होता इस एक शफ्फाक, पाक आवाज़ के जादू से. शराफत की हज़ार कहानिया और बेझोड मासूमियत की हज़ार मिसालें. उन्हें याद करो तो एक याद के पीछे हज़ार यादें दौडी चली आती है. सो कोशिश करता हूँ हज़ार हज़ार बार दोहराई गयी बातों से बचते-बचाते हुए बात करूँ…
अब जैसे कि उनकी पैदाइश “आर्ट ऑफ लिविंग” ने हज़ारों-हज़ार की जिंदगियां बदल दी. आवाम गुस्सा भूलकर समाज की तरक्की में शरीक होने लगा. सुदर्शन क्रिया का मिजाज़ देखिये कि अल सुबह बैठकर हर जवान खून “ध्यान” करता है. क्या बंगलुरु और क्या अमेरिका.. सब के सब गुस्सा भूल रहे है. अजी जनाब ! सिर्फ मुस्कुरा ही नहीं रहे, औरों को भी बरकत दे रहे हैं. और श्री श्री … मिजाज़ से अलमस्त ये फकीर..जिसे जब देखो,हँसता रहता है… और कहता है कि तुम भी हँसो… हँसने का कोई पैसा नहीं…कोई किराया नहीं…
आप कह्नेगे भाई ये सारी लप-धप  छोडकर पहले ज़रा कायदे से उदयपुर में होने वाले उनके सत्संग की बात भी कर लो.. तो लो जनाब.. आपका हुक्म बजाते हैं. इस बकत उदयपुर का कोई मंदिर-कोई धर्म स्थल नहीं छूटा, जहाँ आर्ट ऑफ लिविंग के भजन न गूंजे हो. “जय गुरुदेव” का शंखनाद सुनाई दे रहा है. गली-मोहल्ले,सड़क-चौराहे के हर कोने में “आशीर्वाद” बरसाते पोस्टर- होर्डिंग शहर की आबो-हवा में प्यार का नशा घोल रहे है. होली की मस्ती दुगुनी लग रही है. “अच्युतम केशवम राम नारायणं , जानकी वल्लभं, गोविन्दम हरीम..” कानों में मिश्री घोल रहे है. घर घर न्योता भिजवाया गया है. तो मियाँ, आपको भी चुपचाप महीने की दस तारीख को सेवाश्रम के बी.एन. मैदान पर हाजिरी देनी है. समझ गए .! तमाम कोशिशों के बाद पूरे आठ साल बाद वो पाक रूह सरज़मीं-ए-मेवाड़ आ रही है. शुरू हो रहा है एक नया रिश्ता. एक क्या रिश्तों का पूरा ज़खीरा मिल रहा है. सो रहने दो… मैदान में जाकर खुद देख लेंगे. अभी श्री श्री की बाताँ करते हैं. वर्ना ये उदयपुर के बाशिंदों की मेहनत की स्टोरी तो इतनी लंबी है कि इसे सुनते-सुनाते ही मेरा आर्टिकल पूरा हो जायेगा और उपर से आवाज़ आएगी, “चलो मियाँ, भोत फैला ली, अब समेट लो” सो यही पे बस.

 

इसे कहते है इंसान: 

अक्सर हम लोग इंसान से गिरती हुई इंसानियत को देख देखकर छाती पिटते रहते है. मगर श्री श्री रविशंकर जैसे इंसान की बातें सुनो तो इंसानियत पर भरोसा लौटने लगता है. इस इंसान ने इतनी कामयाबी के बावजूद न तो घमंड को अपने आस पास आने दिया और न दौलत को अपने दिल पर हुकूमत करने दी. ज़रा सोचकर देखे कि इतना कामयाब इंसान कि देश के बड़े बड़े घराने जिसके सामने निचे बैठते है, और अजी घराने ही क्या, कई सारी कंपनियों के पूरे पूरे कुनबे उनको सुनते है.जब वही श्री श्री किसी 5-7 साल के छोटे बच्चे के साथ बैठते है तो बिलकुल बच्चे बन जाते है. शरारती तत्व. मैंने आस्था चेनल के लिए एक शूटिंग श्री श्री के साथ हिमाचल में की थी. वहीँ उनके उस छुपे तत्व को महसूस किया. जहा कोई आडम्बर नहीं, कोई दिखावा नहीं.. सफेद झक एक धोती में एक साधारण किन्तु पवित्र आत्मा. और मज़े की बात. श्री श्री को खुद गाने और भजनों पर नाचने का बहुत शौक है. कई बार स्वयं झूम उठते है. भक्ति-ध्यान-नृत्य-भजन- आनंद का अद्भुत संगम. माशा अल्लाह गजब के उस्ताद है. उस्तादों के उस्ताद,जिन्होंने लाखो करोडो को जीने की दिशा दे दी.

श्री श्री रविशंकर जनाब. उदयपुर की इस खूबसूरत फिजा में आपका तहे दिल से इस्तकबाल. तशरीफ़ लाइए. आज का नौजवां, जो भटक सा रहा है, उसे रास्ता दिखाईये.. वेलकम है जी आपका पधारो म्हारे देस की इस खूबसूरत सर ज़मी पर. मीरा बाई की पुकार सुनी आपने और यहाँ आये…अब हमारी पुकार भी सुन लीजिए. आनंद भर दीजिए. खम्मा घणी….

Also Read:

यो म्हारो उदियापुर है…!

My Udaipur City

यो म्हारो उदियापुर है…!

उदयपुर में एक खास किस्म की नफासत है जो दिल्ली, जयपुर या किसी और शहर में नहीं मिलती. केवल इमारतें या बाग-बगीचें ही नहीं,बल्कि उदयपुरी जुबां भी ऐसी है कि कोई बोले तो लगता है कानों में शहद घोल दिया हो. केवल राह चलते लोग ही नहीं बल्कि इस शहर में तो सब्जी बेचने वाले हो या सोना-चांदी बेचने वाले  सब इसी खास जुबान में ही बात करते है. “रिपिया कई रुखड़ा पे लागे जो थारे ठेला री अणि  हुगली साग ने पांच रिपिया पाव लूँ.. तीन में देनी वे तो देई जा भाया…!” जब बनी ठनी छोटी चाची जी सब्जी वाले से कुछ इस तरह भाव-ताव करती है तो फक्र महसूस होता है  अपनी मेवाडी पर. कई बार तो परकोटे के भीतर माहौल कुछ ऐसा हो जाता है कि अजनबी यही सोचकर कुछ बोलने से डरते है कि वह सबसे अलग दिखने लगेंगे.
केवल उदयपुर के मूल निवासियों या राजपूतों ने ही नहीं बल्कि शहर की इस तहज़ीब भरी जुबां को अन्य समुदायों ने भी अपने जीवन में समाहित किया है.. “म्हारा गाबा लाव्जो मम्मी, मुं हाप्डी रियो हूँ ” ये शब्द सुने मैंने “बड़ी होली” मोहल्ले में रहने वाले एक ईसाई बच्चे के मुह से. यकीन मानिए,इतना सुनने  के बाद कोई नहीं कह सकता कि ये ईसाई है. उस बच्चे के मुह से मेवाडी लफ्ज़ इस खूबसूरती और नरमाई लिए निकल रहे थे कि लगा मानो, वो मेवाडी तहज़ीब का चलता फिरता आइना हो.
उदयपुर के कूंचों में आप मेवाडी ज़बान सुन सकते हैं. मशहूर मांड गायिका मांगी बाई के मुह से “पधारो म्हारे देस” सुनने के लिए दस दस कोस के लोग लालायित रहते है. यहाँ के हर लोक कलाकार, कवि सभी में कहीं न कहीं मेवाडी अंदाज़ ज़रूर झलकता है. और तब  ” पूरी  छोड़ ने आधी खानी, पण मेवाड़ छोड़ने कठेई नि जानी” कहावत सार्थक हो उठती है. . कवि “डाडम चंद डाडम” जब अपनी पूरी रंगत में आकर किसी मंच से गाते हैं- “मारी बाई रे कर्यावर में रिपिया घना लागी गिया.. इ पंच तो घी यूँ डकारी गिया जू राबड़ी पि रिया वे…” तो माहौल में ठहाका गूँज उठता है.

बात राबड़ी की निकली तो दूर तलक जायेगी…

बचपन में सुना करते थे कि अगर सुबह सुबह एक बड़ा कटोरा भरके देसी मक्की की राब पी ली जाये तो दोपहर तक भूख नहीं लगती. जो लोग गाँव से ताल्लुक रखते है, उन्हें वो दृश्य ज़रूर याद आता होगा, जब आँगन के एक कोने में या छत पर जल रहे चूल्हे पर राबड़ी के  तोलिये (काली बड़ी मटकी,जिसे चूल्हे पर चढ़ाया जाता था)से भीनी भीनी खुशबु उठा करती थी और घर के बुज़ुर्ग चिल्लाते थे.. “अरे बराबर हिलाते रहना, नहीं तो स्वाद नि आएगा.” और देसी लफ़्ज़ों में कहे तो “राब औजी जाई रे भूरिया” ..
वो भी गजब के  ठाठ थे राबड़ी के, जिसके बिना किसी भी समय का भोजन अधूरा माना जाता था. मक्की की उस देसी राब का स्वाद अब बमुश्किल मिल पाता है. होटलों में राब के नाम पर उबले मक्की के दलिये को गरम छाछ में डालकर परोस देते है.
“दाल बाटी चूरमा- म्हारा काका सुरमा “
चूल्हे पर चढ़ी राब और निचे गरम गरम अंगारों पर सिकती बाटी. नाम सुनने भर से मुह में पानी आ जाता है. पहले देसी उपलों के गरम अंगारों पर सेको, फिर गरम राख में दबा दो.. बीस-पच्चीस मिनट बाद बहार निकाल कर.. हाथ से थोड़ी दबाकर छोड़ दो घी में..  जी हाँ, कुछ ऐसे ही नज़ारे होते थे चंद बरसों पहले.. अब तो बाफला का ज़माना है. उबालो-सेको-परोसो.. का ज़माना जो आ गया है. अब घर घर में ओवन है, बाटी-कुकर है. चलिए कोई नहीं. स्वाद वो मिले न मिले..बाटी मिल रही है, ये ही क्या कम है !!
अब शहर में कही भी उस मेवाडी अंदाज़ का दाल-बाटी-चूरमा नसीब नहीं. एक-आध रेस्टोरेंट था तो उन्होंने भी क्वालिटी से समझौता कर लिया. कही समाज के खानों में बाटी मिल जाये तो खुद को खुशकिस्मत समझते हैं. और हाँ, बाटी चुपड़ने के बाद बचे हुए घी में हाथ से बने चूरमे का स्वाद… कुछ याद आया आपको !
आधी रात को उठकर जब पानी की तलब लगती है तो दादी का चिर परिचित अंदाज़ सुनने को मिलता है.. “बाटी पेट में पानी मांग री है”  चेहरे पर मुस्कान आ जाती है.

“मैं मेवाड़ हूँ.”
मोतीमगरी पर ठाठ से विराजे महाराणा प्रताप सिंह जी, चेटक सर्किल पर रौब से तीन टांग पर खड़ा उनका घोडा चेटक… जगदीश मंदिर की सीढियाँ  चढ़ता फिरंगी और अंदर जगन्नाथ भगवान के सामने फाग गाती शहर की महिलाएं.. गणगौर घाट के त्रिपोलिया दरवाज़े से झांकती पिछोला.. नेहरु गार्डन में मटके से पानी पिलाती औरत की मूर्ति, सहेलियों की बाड़ी मे छतरी के ऊपर लगी चिड़िया के मुह से गिरता फिरता पानी.. गुलाब बाग में चलती छुक छुक रेल, सुखाडिया सर्किल पर इतनी बड़ी गेहूं की बाली… लेक पेलेस की पानी पर तैरती छाया, दूर किसी पहाड़ से शहर को आशीर्वाद देती नीमच माता… जी हाँ ये हमारा उदयपुर है.
शहर की इमारतों का क्या कहना.. मेवाड़ के इतिहास की ही तरह ये भी भव्य है..अपने में एक बड़ा सा इतिहास समेटे हुए. पिछोला किनारे से देखने पर शहर का मध्य कालीन स्वरुप दिखता है. यूँ तो उदयपुर को कहीं से भी देखो,ये अलग ही लगता है पर पिछोला के नज़ारे का कोई तोड़ नहीं. एक तरफ गर्व से सीना ताने खड़ा सिटी पेलेस.. तो दूसरी तरफ होटलों में तब्दील हो चुकी ढेर सारी हवेलियाँ. जाने कितने राजपूतों के आन-बाण शान पर खड़ा है ये शहर..
शाम के समय मोती मगरी पर “साउंड और लाईट शो” चलता है. यहीं पर स्थित मोती महल में प्रताप अपने कठिनाई भरे दिनों में कुछ दिन ठहरे थे. खंडहरों पर जब रौशनी होती है और स्वर गूंजता है…”मैं मेवाड़ हूँ” तो यकीन मानिये आपका रोम रोम खड़ा हो जाता है. कुम्भा, सांगा, प्रताप, मीरा, पन्ना, पद्मिनी… जाने कितने नाम गिनाये… तभी माहौल में महाराणा सांगा का इतिहास गूँजता है. कहते ही उनका जन्म तो ही मुग़लों को खदेड़ने के लिए हुआ था. उनकी लहराती बड़ी बड़ी मूंछें,गहरे अर्थ लिए शरीर के अस्सी घाव, लंबा और बलिष्ठ बदन उनके व्यक्तित्व को और अधिक प्रभावशील बना देता था. और तभी मुझे मेरठ  के मशहूर वीर रस कवि “हरी ओम पवार” के वे शब्द याद आते है… ” अगर भारत के इतिहास से राजस्थान निकाल दिया जाये, तो इतिहास आधा हो जाता है.. पर राजस्थान से अगर मेवाड़ को निकाल दिया जाये, तो कुछ नहीं बचता !”

इसी बीच घूमते घूमते आप देल्ही गेट पहुच जाये और “भोला ” की जलेबी का स्वाद लेते लेते अगर आपको ये शब्द सुनने को मिल जाये.. ” का रे भाया..घनो हपड हापड जलेबियाँ चेपी रियो हे.. कम खाजे नि तो खर्-विया खावा लाग जायगा.” तो यकीन मानिये आप ने शहर को जी लिया… वैसे उदयपुर निहायत ही खूबसूरत शहर है, और जब हम इसकी जुबान, खान पान की  बात छेड़ देते है तो बहुत कुछ आकर्षक चीज़ें हमसे छूट जाती है..

 

कोई तो ध्यान दो इधर !! – The Dirty Pictures

Ugly state of Lake Pichola near Hotel Taj Lake Palace

दुनियाभर के पर्यटक उदयपुर क्यों आते है ?? जवाब आसान है. यूँ तो बहुत कुछ है उदयपुर में देखने, महसूस करने के लिए पर मुख्यतः यहाँ की झीलें निहारने के लिए विदेशी पर्यटक और हमारे अपने देशवासी भी बार बार उदयपुर का रुख करते है.  किन्तु आज अगर झीलों की दशा पर गौर करें तो पाएंगे कि शायद हम लोग हमारी विरासत संभाल नहीं पा रहे. मेवाड़ के महाराणाओ ने भी नहीं सोचा होगा कि उनके सपनो की कालांतर में हकीकत कुछ और होगी. अगर आप हमारी बात से इत्तेफाक नहीं रखते तो चलिए आज आपको शहर की झीलों का भ्रमण करा ही देते है.
शुरुआत करते हैं फतहसागर से. मुम्बईया बाजार में आपका स्वागत है.  आप आराम से किनारे पर बैठिये. ब्रेड पकोडे का आनंद लीजिए.. यहाँ की कुल्हड़ काफी का स्वाद स्वतः मुह में पानी ला देता है.  पर गलती से भी नीचे  झील में झाँकने की भूल मत कीजिये. आपको शहर की खूबसूरती पर पहला पैबंद नज़र आ जायेगा. जी हाँ.. इतनी गन्दगी.. पानी में इतनी काई. न तो नगर परिषद की टीम यहाँ नज़र आती है न ही झील हितैषी मंच.! वैसे आप भी कम नहीं है.. याद कीजिये, कितनी बार काफी गटकने के बाद आपने कुल्हड़ या थर्मोकोल गिलास कचरा  पात्र में डाला.. न कि झील में.. “अजी कुल्हड़ तो मिट्टी का है, पानी में मिल जायेगा...” बेहूदा जवाब नहीं है ये? आगे बढ़कर फतहसागर के ओवरफ्लो गेट को तो मत ही देखिएगा. यहाँ गन्दगी चरम पर है.

dirty lake fatehsagar
पिछोला घूमे है कभी ? सच्ची !! चलिए एक बार फिर पिछोला की परिक्रमा करते है . कितना खूबसूरत दरवाज़ा है. नाम चांदपोल. वाह ! बेहतरीन पुल. पर गलती से भी चांदपोल के ऊपर से गुज़रते वक्त दायें-बाएं पिछोला दर्शन मत कीजियेगा.. आपको मेरी कसम. अब मेरी कसम तोड़कर देख ही लिया तो थोडा दूर लेक पेलेस को देखकर अपनी शहर की खूबसूरती पर मुस्कुरा भर लीजिए, पुल से एकदम नीचे या यहाँ-वहाँ बिलकुल नहीं देखना.. वर्ना पड़ोस की मीरा काकी, शोभा भुआ घर के तमाम कपडे-लत्ते धोते वहीँ  मिल जायेगी. आप उनको पहचान लोगे, मुझे पता है. पर वो आपको देखकर भी अनदेखा कर देगी..! जैसे आपको जानती ही नहीं.  चलिए उनको कपडे धोने दीजिए. आप तब तक पानी पर तैर रही हरी हरी काई और जलकुम्भी को निहारिए.

Lake Pichola

lake Pichola
झीलों के शहर की तीसरी प्रमुख झील स्वरुप सागर की तो बात ही मत कीजिये. पाल के नीचे लोहा बाजार में जितना कूड़ा-करकट न होगा,उतना तो झील में आपको यूँ ही देखने को मिल जायेगा. याद आया! वो मंज़र..जब झीलें भर गयी थी और इसी स्वरुप सागर के काले किवाडों से झर झर बहता सफ़ेद झक पानी देखा था. पर फ़िलहाल पानी मेरी आँखों में आ गया.. न न झील के हालात को देखकर नहीं, पास ही में एक मोटर साइकिल  रिपेयरिंग की दूकान के बाहर से उठते धुएं ने मेरी आँखों से पानी बहा ही दिया.

Lake Swaroopsagar

Photo By Kailash Tak

कुम्हारिया तालाब  और रंग सागर. क्या … मैंने ठीक से सुना नहीं…आपको नहीं पता कि ये कहाँ है ! अजी तो देर किस बात की. अम्बा माता के दर्शन करने के पश्चात वहीँ  अम्बा पोल से  अंदरूनी शहर में प्रवेश करते है (शादी की भीड़ को चीरकर अगर पहुच गए तो) तो पोल के दोनों तरह जो  दिखाई दे रहा  है, वो दरअसल झील है. ओह..याद आ गया आपको. “पर पानी कहाँ है. !” कसम है आपको भैरूजी बावजी की. ऐसा प्रश्न मत पूछिए. ये झील ही है पर देखने में झील कम और “पोलो ग्राउंड ” ज्यादा लगते है. वजह साफ़, पानी कम है और जलकुम्भी ज्यादा. चलिए अच्छा है. अतीत मे