नुक्कड़ नाटक ‘‘जीवन की दुकान’’ से लोगों को किया जागरूक

उदयपुर । विश्व पर्यावरण दिवस के मौके पर उदयपुर की नाट्य संस्था नाट्यांश एवं पुकार के युवाओं ने पर्यावरण के प्रति जागरूकता दिखाते हुए उदयपुर के विभिन्न क्षेत्रों में पौधारोपण किया। दोनो संस्थाओं ने उदयपुर के हिरणमगरी सेक्टर 9, सेक्टर 6, भुवाणा, मुल्लातलाई, सेन्ट्रल जेल इत्यादि क्षेत्रों में पौधारोपण किया गया।

नुक्कड़ नाटक के बाद पुकार एवं नाट्यांश की तरफ से सभी आमजन को पौधे बांटे गये एवम् शपथ दिलवाई गई कि वे अपने आसपास के सभी पौधों का सम्मान एवं ख्याल रखेगें ।

Natyansh
शाम को नाट्यांश के युवा रंगकर्मियों ने अपने नुक्कड़ नाटक ‘‘जीवन की दुकान’’ के माध्यम से सवाल उठाये। वर्तमान में पर्यावरण की नाजु़क हालात को देखते हुए पेड़ो को बचाने एवं पेड़ो को लगाने का संदेश दिया। नाट्यांश द्वारा आयोजित यह नुक्कड़ नाटक व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए पर्यावरण पहँुचायी गयी हानियो पर आधारित है।
मानव जाति सभी कुछ जानते हुए भी प्राकृतिक संपदाओं का शोषण कर रही है तथा इस शोषण से भविष्य मे आने वाली प्राकृतिक आपदाओं से अनजान बनी हुई है। मानव जाति की इसी सोई सोच को बदलने के लिए और लोगो को जागृत करने के लिए नुक्कड़ नाटक का प्रभावी मंचन किया गया।
नाटक मंचन फतेहसागर की पाल पर हुआ। साथ ही उदयपुर वासियों को गुलमोहर, अमरुद, जामुन और शिशम के पौधो का निशुल्क वितरण कर के पर्यावरण के रक्षक, पेडो़ को बचाने एवं नये पेड़ लगा कर उनके बड़े होने तक पेड़ो की देखभाल का संकल्प लिया।

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इस नुक्कड़ नाटक के संयोजक नुरूननिसा ने बताया की नाटक लेखन का कार्य अमित श्रीमाली एंव अशफाक नुर ख़ान ने मिल कर किया है। नाटक के कलाकारों में मोहम्मद रिज़वान, शुभम शर्मा, नेहा पुरोहित, श्लोक पिंपलकर, अश्फाक नुर खान पठान, जोहान शेख एवं महेन्द्र डांगी, अब्दुल मुबिन खान पठान, विशाल राज, मोहक, शिखा भोलावत, भुवनेश, आयुष, दर्शन आदि थे।
नाटक का सारांश
नाटक ‘‘जीवन की दुकान’’ की चार दोस्तों की कहानी है। जिनमे से तीन दोस्त एक व्यवसाय की योजना बनाते है। ये तीनों दोस्त आॅंक्सीजन मेकिंग फेक्ट्री के फायदे के लिए दुनिया के तमाम जंगल एंव पेडों को तबाह करने की योजना बनाते है। किन्तु इनका चैथा दोस्त इन तीनों को पेडा़े के महत्व के बारे में समझाता है। साथ ही बिना पेडा़े के भविष्य की एक झलक भी दिखाता है। बिना पेडो के भविष्य को देखने के बाद तीनों दोस्त पेड़ो को काटने के बारे मे सोचना छोड़कर पेडा़े को बचाने के बारे मेे सोचना शुरू कर देते है।