लोकदेवता सगसजी – Local Deity Sagas Ji

सगसजी – Sagas Ji

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मेवाड़ – महाराणा राजसिंह (1652-1680) बड़े पराक्रमी, काव्य- रसिक और गुणीजनों के कद्रदान थे साथ ही बड़े खूखार, क्राधी तथा कठोर हृदय के भी थे। इनका जन्म 24 सितम्बर, 1629 को हुआ। इन्होंने कुल 51 वर्श की उम्र पाई। इनके आश्रय में राजप्रषस्ति, राजरत्नाकर, राजविलास एवं राजप्रकाष जैसे महत्वपूर्ण ग्रंथ लिखे गये।

राजसमंद जैसी बड़ी कलापूर्ण एवं विषाल झील का निर्माण कराने का श्रेय भी इन्ही महाराणा को है। इसकी पाल पर, पच्चीस षिलाओं पर राज – प्रषस्ति महाकाव्य उत्कीर्ण है। 24 सर्ग तथा 1106 ष्लोकों पर वाला यह देष का सबसे बड़ा काव्य-ग्रंथ है।
महाराणा राजसिंह ने मेवाड़ पर चढ़ आई, बादषाह औरंगजेब की सेना का बड़ी बहादुरी से मुकाबला किया और उसे तितर-बितर कर बुरी तरह खदेड़दी। इनके तीन पुत्र हुए। सबसे बड़े सुल्तानसिंह, फिर सगतसिंह और सबसे छोटे सरदारसिंह। इनके कुल आठ रानियां थी। सबसे छोटी विचित्रकुंवर थी। यह बीकानेर राजपरिचारकी थी।

विचित्र कुंवर बहुत सुन्दर थी। महाराणा राजसिंह ने उनके सौंदर्य की चर्चा सुनी हुई थी। अतः महाराणा द्वारा विचित्र कुंवर से षादी का प्रस्ताव भिजवाया गया। महाराणा ने प्रस्ताव अपने लिए भिवाया था किन्तु बीकानेर वाले इसे कुंवर सरदार सिंह से विवाह काप्रस्ताव समझते रहे कारण कि विचित्र कुंवर उम्र में बहुत छोटी थी। सरदारसिंह उससे मात्र तीन वर्श बड़े थे।

विवाहपरान्त विचित्र कुंवर और सरदारसिंह का सम्बन्ध माॅं – बेटे के रुप में प्रगाढ़ होता गया। अधिकांष समय दोनों का साथ- साथ व्यतीत होता। साथ – साथ भोजन करते, चैपड़ पासा खेलते और मनोविनोद करते। इससे अन्य को ईश्र्या होने लगी, फलस्वरुप महलों में उनके खिलाफ छल, प्रपंच एवं धोखा, शड़यंत्र की सुगबुगाहट षुरु हो गई। मुॅंह लगे लोग महाराणा के कान भरने लग गये।

इन मुॅंहलगों में उदिया भोई महाराणा का प्रमुख सेवक था। उसे रानी विचित्र कुवंर और राजकुमार सरदारसिंह का प्रेम फूट िआॅ।ख भी नहीं दंखा गया। वह प्रतिदिन ही उनके खिलाफ महाराणा को झूठी मूठी बातें कहकर उद्वेलित करता। कई तरह के अंट संट आरोप लगाकर उन्हें लांछित करता। यहां तक कि दोनों के बीच नाजायज संबन्ध जैसी बात कहने में भी उसने तनिक भी संकोच नहीं किया। इससे महाराणा को दोनों के प्रति सख्त नफरत हो गई।
एक दिन उदिया ने अवसर का लाभ उठाते हुए महाराणा से कहा कि अन्नदाता माॅं – बेटे की हरकतें दिन दूनी बढ़ती जा रही है। जब देखो तब हॅंसी ठट्ठा करते रहते है। साथ – साथ खेलते रमते है। साथ – साथ् भोजन करते है और साथ – साथ सो भी जाते है। यह सब राजपरिवार की मर्यादा के सर्वथा प्रतिकूल है जो असह्य है और एक दिन बदनामी का कारण सिद्ध होगा।
Sagas Ji Bavji in Udaipur मुॅंहलगे उदिया का यह कथन महाराणा राजसिंह के लिए अटूट सत्य बन गया। उन्होंने जो कुछ सुना-देखा वह उदिया के कान – आॅंख से ही सुना देखा अतः मन में बिठा लिया कि रानी और कुंवर के आपसी सम्बन्ध पवित्र नहीं है। गुस्से से भरे हुए महाराणा ने उदिया को कहा कि कुंवर को मेरे समक्ष हाजिर करो।

प्रतिदिन की तरह कुंवर ग्यारह बजे के लगभग यतिजी से तंत्र विद्या सीखकर आये ही थे। फिर भोजन किया और रानीजी के कक्ष में ही सुस्ताने लगे तब दानों को नींद आ गई। उदिया के लिए दोनों की नींद अंधे को आॅंख सिद्ध हुई। वह दोड़ा – दोड़ा महाराणा के पास गया और अर्ज किया कि रानीजी और कुंवरजी एक कक्ष में सोये हुए है, हुजूर मुलाइजा फरमा लें। उदिया महाराणा के साथ आया और रानी का वह कक्ष दिखाया जिसमें दोनों जुदा – जुदा पलंग पर पोढ़े हुए थे।

महाराणा का षक सत्य में अटल बन रहा था। उदिया बारी – बारी से पांच बार कुवंर को हजुर के समक्ष हाजिर करने भटकता रहा पर कुंवर जाग नहीं पाये थे। छठी बा रवह जब पुनः उस कक्ष में पहुॅंचा तो पता चला कि कुंवर समोर बाग हवाखोरी के लिए गये हुए है। उदिया भी वही जा पहुंचा और महाराणा का संदेष देते हुए षीघ्र ही महल पहुंचने को कहा।

कुंवर सरदारसिंह बड़े उल्लासित मन से पहुॅंचे किन्तु महाराणा के तेवर देखते ही घबरा गये और कुछ समझ नहीं पाये कि उनके प्रति ऐसी नाराजगी का क्या कारण हो सकता है। महाराणा ने कुंवर की कोई कुषलक्षेेम तक नहीं पूछी और न ही मुजरा ही झेल पाये बल्कि तत्काल ही पास में रखी लोहे की गुर्ज का उनके सिर पर वार कर दिया। एक वार के बाद दूसरा वार और किया तथा तीसरा वार गर्दन पर करते ही सरदारसिंह बुरी तरह लड़खड़ा गये।

राजमहल के षंभु निवास में यह घटना 4.20 पर घटी। यहां से कुंवर सीधे षिवचैक में जा गिरे। भगदड़ और चीख सुनकर राजपुरोहित कुलगुरु सत्यानन्द और उनकी पत्नी वृद्धदेवी दौड़े – दौड़े पहुॅंचे। कुंवर की ऐसी दषा देख दोनों हतप्रत हो गये। वृद्ध देवी ने अपनी गोद में कुंवर का सिर रखा और जल पिलाया। प्राण पखेरु खोते कुंवर ने कहा – मैं जा रहा हूॅं। पीछे से मेरी डोली न निकाली जाय। मुझे षैय्या पर ही ले जाया जाय यही हुआ। महाराणा तो चाहते भी यही थे कि उनकी दाहक्रिया भी न की जाय किन्तु कुल गुरु और गुरु पत्नी ने सोचा कि चाहे राजपरिवार से कितना ही विरोध लेना पड़े और किन्तु राजकुमार की षव यात्रा तो निकाली जाएगी।

षवयात्रा आयड़ की पुलिया पर पहुॅंची। वही पुलिया के चबूतरे पर अर्थी रखी गई । इतने में पास ही में निवास कर रहे यतिजी को किसी ने राजकुमार सरदारसिंह के नहीं रहने की सूचना दी। यतिजी को इस पर तनिक भी विष्वास नहीं हुआ कारण कि सुबह तो राजकुमार उनके पास आये थे।

यह यति चन्द्रसेन था जो बड़ा पंहुचा हुआ तांत्रिक था। इसके चमत्कार के कई किस्से जनजीवन में आज भी सुनने को मिलते है। राजकुमार भी इनसे कई प्रकार की तंत्र विद्या में पारंगत हो गये थे। यहां तक कि उन्होंने स्वयंमेव उड़ाने भरने की कला में महारत हासिल कर ली थी। दौड़े – दौड़े यतिजी वहां आये । कुंवर को अपने तंत्र बल से जीवित किया। दोनों कुछ देर चैपड़ पासा खेले। उसके बाद यतिजी बोले अब अर्थी वर्थी छोड़ो और पूर्ववत हो जाओ। इस पर राजकुमार बोले नहीं जिस दुर्गति से मैं मृत्यु को प्राप्त हुआ, अब जीना व्यर्थ है। इस पर यति ने पानी के छींटे दिये और कुंवर को मृत किया। आयड़ की महासतिया जी में राजकुमार का दाह संस्कार किया गया। कहते है कि इस घटना से राजपुराहित दंपत्ति का मन ग्लानि से भर गया और जीवित रहने की बजाय दोनों ही कुंवर की चिता में कूद पड़े।

उधर जब राजकुमार सरदारसिंह के निधन के समाचार बीकानेर की रानी विचित्र कुंवर को मिले तो वह अपने हाथ में नारियल लेकर सती हो गई।
महाराणा राजसिंह के सबसे बड़े पुत्र सुल्तानसिंह की भी हत्या की गई । यह हत्या सर्वऋतु विलास में भोजन में जहर देकर की गई। यद्यपिइ स हत्याकंाड में महाराणा की कोई भूतिका नहीं थी। किन्तु उनके षासनकाल में होने और फिर हत्या करने वालों की काई खबर खोज नहीं की गई अतः इसका पाप भी उन्ही को लगा। उनके जीवनकाल में तीसरी हत्या उनके साले अर्जुनसिंह की की गई । ये मारवाड़ के थे और गणगौर पर सवारी देखने उदयपुर आए हुए थे। इनके बहिन रतनकुंवर थी जो राणाजी से विवाहित थी। ये करीब 35 वर्श के थे। जब सर्वऋतु विलास में घूम रहे थे कि सामने आता एक इत्र बेचने वाला दिखाई दिया । वह निराषा के भाव लिए था। अर्जुनसिंह से बोला महलो में गया किन्तु निराष ही लौटा। किसी मेरा इत्र नहीं लिया। लगा यहां के राणाजी इत्र के षौकीन नहीं है ष उन्हें अच्छे इत्र की पहचान नहीं है। अर्जुनसिंह को यह बात अखरी। उसने इसे मेवाड़ राज्य का अपमान समझा। म नही मन सोचा कि अच्छा यही हो, इसके पास जितना भी इत्र है, सबका सब खरीद लिया जाय ताकि यह समझे कि जो इत्र उसके पास है वैसा तो यहां के घोड़े पसंद करते है।

यह सोच अर्जुनसिंह ने उसे इत्र दिखाने को कहा । इत्र वाला दिखाता जाता और अर्जुनसिंह उसे अपने घोड़े की असाल में उड़ेलने को कहते।
ऐसा करते करते अर्जुनसिंह ने सारा इत्र खरीदकर , मुॅंह मांगी कीमत देकर मेवाड़ के गौरव की रक्षा की। किन्तु मुॅंह लगे लोगों ने इसी बात को विपरीत गति – मति से महाराणा के सामने प्रस्तुत करते हुए कहा कि अर्जुनसिंह कौन होते है जिन्होंने इस तरह का सौदा कर मेवाड़ की इज्जत एवं आबरु को मिट्टी में मिला दी। क्या मेवाड़नाथ का खजाना खाली है जो उन्होंने अपने पैसे से इत्र खरीदकर मेवाड़ को निचा दिखाया।

महाराणा को यह बात बुरी तरह कचोट गई। पीछोला झील में गणगौर के दिन जब नाव की सवारी निकली तो बीच पानी में षराब के साथ जहर दिलाकर महाराणा ने उनका काम तमाम कर दिया। वे चलती नाव में ही लुढ़क गये और उनके प्राण पखेरु उड़ गये। ये ही अर्जुन सिंह आगे जाकर गुलाब बाग की सुप्रसिद्ध बावड़ी के निकट प्रगट हुए और सगत्जी बने।

महाराणा राजसिंह ने उपुर्यक्त तीनों हत्याओं के लिए प्रायष्चित स्वरुप राजसमंद का निर्माण कराया, ब्रह्मभोज दिया तथा गोदान कराया।

 

महंत मिट्ठा लाल चित्तोड़ा
सागर जी शक्ति पीठ . दाता भवन 21
जोगपोल मंडी की नाल , उदयपुर
दूरभाष : 9414248195  [सुशील कुमार चित्तोड़ा]

 

Sagas Ji Bavji Udaipur

Source : Pratyush

मेरे सपनो की बारिश, कब आओगी तुम ??

clouds in udaipur

वर्षा ऋतू हमें गहराई तक छूती है. सावन में सिर्फ तन ही नहीं भीगता, अंदर तक भिगो जाती है बरखा की बूंदें… सावन की रिम झिम फुहारों के बीच उगते अंकुरों, हरे होते पहाड़ों और, और ज्यादा गहराई तक नीली होती झीलों के बीच हमारा मन “किसी की चाह” हेतु व्याकुल हो उठता है.

पर इस बार चाह किसी और की नहीं, बल्कि बारिश की ही है. ये आये तो किसी और को याद करने का मौक़ा मिले ना ! हरियाली अमावस पर, सोचा कि शहर के कमीनेपन से दूर जब गांव के निर्मल मन फतहसागर और सहेलियों की बाड़ी आयेंगे तो इंद्र को मजबूर होना ही पड़ेगा… पर इस बार भी हमेशा की तरह मेरा अनुमान गलत निकला ! उनकी पुपाडी की आवाज़ मेघों तक नहीं पहुंची. उनका सजना सवरना व्यर्थ गया…!!

 

“सावन आयो रे, ओ जी म्हारा, परणी जोड़ी रा भरतार,

बलम प्यारा, सावन आयो रे…”

 

सावन तो आयो पण बरखा कोनी आई .. परणी जोड़ी का भरतार, अब तुझे कैसे पुकारें..!! कालिदास ने मेघदूत ग्रन्थ में अपना संदेसा पहुँचाने के लिए बादलों को जरिया बनाया था.. वे जाकर प्रेमिका पर बरसते थे.. यहाँ तो सबकुछ सूखा- सूखा… कैसे भीगेगा प्रेमिका का तन- मन… क्या जुगत बिठाये अब ??

बचपन के दिन याद आते है. मुझे बचपन में अपनी भुआजी के यहाँ गांव में रहने का खूब मौका मिला. बारिश में भीगते भीगते खूब जामुन खाते थे. पेड पर चढ़ने की भी ज़रूरत नहीं होती थी, खुद-ब-खुद जामुन बारिश की मार से ज़मीं पर आ गिरते थे. मक्की की बुवाई होती थी… गीली मूंगफली को खेतों की पाल पर ही सेक कर खाते थे. भुट्टे का मज़ा, मालपुए की ठसक…क्या क्या आनंद होते थे. कच्ची झोपडी के केलुओं से बारिश की झर झर गिरती धार… और उस पर गरमा गरम राब… भुआ तवे पर चिलडे बनाती थी..आटे का घोल जब गरम गरम तवे पर गिरता था तो एक सौंधी महक मन में बस जाती थी. गांव के लोग इकठ्ठा होकर एक जगह सामूहिक प्रसादी करते थे. तेग के तेग भरकर खीर बनती थी और बनती थी बाटियां … आज बस उनकी यादें शेष है. आज 260 रुपये किलो वाले मालपुए लाकर खा लेते है, और खुश हो लेते है.. पर उसमे माटी की वो सौंधी खुशबु नहीं होती.

खैर अब अपन शहर में रहते है. कार की खिडकी खोलकर बारिश में हाथ भिगोने का मज़ा हो या बाइक लेकर फतहसागर पर चक्कर लगाने का मौका… हमें सब चाहिए, पर निगोडी बारिश पता नहीं किस जनम का बदला ले रही है.. उमस ने जीना मुहाल कर रखा है. खाली फतहसागर पर मन नहीं लगता. पिछोला में देवास का पानी आने की क्षणिक खुशी हुई ही थी कि लो जी वहाँ भी चक्कर पड़ गया. अब तो बस श्रीनाथजी का ही आसरा है. क्योंकि बारिश नहीं हुई तो उनका नौका विहार कैसे होगा. लालन लालबाग कैसे जायेंगे, बंशी कैसे बजेगी, गायें क्या खायेगी…! हम तो जैसे जैसे दो दिन में एक बार आ रहे नल के पानी से काम चला लेंगे किन्तु अगर बारिश नहीं आई तो बेचारे ये निरीह पशु क्या खायेंगे ? गलती इंसान की और भुगते सारे जीव-जंतु..!!! मन बस बार बार अपने   को निर्दोष पाते हुए अपील कर रहा है …
काले मेघा काले मेघा, पानी तो बरसाओ….

Photo by : Mujtaba R.G.

होली – नए रंग नयी उमंग मेरे शहर में…..

Holi Celebration Udaipur फतेहसागर और पिछोला में  पानी की गपशप है. सहेलियों की बाड़ी में गीत मुखर हो गए है, गुलाब बाग में तरुनाई का नृत्य है, रंग चटक हो गए है. सुखाडिया सर्किल पर उम्र और जात पात की दीवारें टूट रही  है और राणा उदयसिंह जी की नगरी संगीत में नहा रही है. उदयपुर में अरावली की पर्वत मालाएं बोलने को आतुर है, नाथद्वारा बसंत की अगवानी को तैयार है, यह ठाकुर द्वारा मेवाड़ में गुजरात का द्वार है. रंगो का पावन त्यौहार, राधा कृष्ण के प्रेम का त्यौहार, भाईचारे और संगम का त्यौहार. पूरे भारतवर्ष में मनाई जाने वाली होली का मुख्य केन्द्र मथुरा और वृन्दावन है. यह बसंत के आगमन की खुशी है. Buying Colors on Holi आज होली का त्यौहार है. सुबह से ही दुकानों पर भीड़ है, रंग-पिचकारी, मालपुआ-गुझिये और भांग-ठंडाई की मनुहार है, अपनों का अपनों को इंतज़ार है, अतिथियों का सत्कार है. बाजारों में बुजुर्ग पाग का अदब है, हाथीपोल पर युवा रंगो का गुबार है, सर्किल पर चेतक अकेला खड़ा है, उसे महाराणा का इंतज़ार है. मेवाड़ में यह अपनापन उसकी अनूठी विरासत है. Udaipur Market रंगो के साथ हवा में घुलती उमंग ने शहर को सतरंगी चादर से ढक दिया है. नयी फसल- नया धान आने को आतुर है,  लोग घरों से निकल कर गलियों में आ गए है, और आज मजबूरी में ही सही, मोबाइल से निजात पा गए है, चटक रंगो के साथ चेहरे खिल उठे है. आज उदयपुर की फिजा का अलग ही दृश्य है. घर घर की रसोई में माँ बेटी से रौनक है, घी की खुशबू फैली है, बच्चे हुडदंग मचा रहे है. दुर्भाग्यपूर्ण है की इस उत्साह के व्यवसायीकरण ने बाजारों में ढाक और पलाश के फूलों से बने प्राकृतिक रंग की जगह कृतिम रंग और डाई को ला दिया है. फूहड़पन और अतिआधुनिकता में सतरंगी इन्द्रधनुष का कोई रंग खो ना जाये, जल और वायु में प्रदुषण का स्तर बढ़ ना जाये, इसका ध्यान रखना होगा. उदयपुर की प्रकृति को संजोये रखना हमारा हमारे शहर के प्रति पहला कर्तव्य है. मौसम के बदलाव से चर्म रोग, नेत्र रोग और श्वास से सम्बंधित बीमारियों के दस्तक देने की संभावना है, इनसे बचना होगा. प्राकृतिक रंगो का प्रयोग करे, सूखी होली खेले, जल बचाए. कोई भी एलर्जी होने पर तुरंत डॉक्टर को दिखाए. बसंत का स्वागत कीजिये, खूब खुशियाँ बटोरिये और सबमें बाटियें. हम कामना करते है की आप रंगो का यह पर्व उत्साह और उमंग से मनाएं और बार बार मनाएं. मेवाड़ के सभी वासियों को उदयपुर ब्लॉग की ओर से होली की हार्दिक शुभकामनाएँ. Happy Holi Udaipur

Photos by : Mujtaba R.G.

यो म्हारो उदियापुर है…!

My Udaipur City

यो म्हारो उदियापुर है…!

उदयपुर में एक खास किस्म की नफासत है जो दिल्ली, जयपुर या किसी और शहर में नहीं मिलती. केवल इमारतें या बाग-बगीचें ही नहीं,बल्कि उदयपुरी जुबां भी ऐसी है कि कोई बोले तो लगता है कानों में शहद घोल दिया हो. केवल राह चलते लोग ही नहीं बल्कि इस शहर में तो सब्जी बेचने वाले हो या सोना-चांदी बेचने वाले  सब इसी खास जुबान में ही बात करते है. “रिपिया कई रुखड़ा पे लागे जो थारे ठेला री अणि  हुगली साग ने पांच रिपिया पाव लूँ.. तीन में देनी वे तो देई जा भाया…!” जब बनी ठनी छोटी चाची जी सब्जी वाले से कुछ इस तरह भाव-ताव करती है तो फक्र महसूस होता है  अपनी मेवाडी पर. कई बार तो परकोटे के भीतर माहौल कुछ ऐसा हो जाता है कि अजनबी यही सोचकर कुछ बोलने से डरते है कि वह सबसे अलग दिखने लगेंगे.
केवल उदयपुर के मूल निवासियों या राजपूतों ने ही नहीं बल्कि शहर की इस तहज़ीब भरी जुबां को अन्य समुदायों ने भी अपने जीवन में समाहित किया है.. “म्हारा गाबा लाव्जो मम्मी, मुं हाप्डी रियो हूँ ” ये शब्द सुने मैंने “बड़ी होली” मोहल्ले में रहने वाले एक ईसाई बच्चे के मुह से. यकीन मानिए,इतना सुनने  के बाद कोई नहीं कह सकता कि ये ईसाई है. उस बच्चे के मुह से मेवाडी लफ्ज़ इस खूबसूरती और नरमाई लिए निकल रहे थे कि लगा मानो, वो मेवाडी तहज़ीब का चलता फिरता आइना हो.
उदयपुर के कूंचों में आप मेवाडी ज़बान सुन सकते हैं. मशहूर मांड गायिका मांगी बाई के मुह से “पधारो म्हारे देस” सुनने के लिए दस दस कोस के लोग लालायित रहते है. यहाँ के हर लोक कलाकार, कवि सभी में कहीं न कहीं मेवाडी अंदाज़ ज़रूर झलकता है. और तब  ” पूरी  छोड़ ने आधी खानी, पण मेवाड़ छोड़ने कठेई नि जानी” कहावत सार्थक हो उठती है. . कवि “डाडम चंद डाडम” जब अपनी पूरी रंगत में आकर किसी मंच से गाते हैं- “मारी बाई रे कर्यावर में रिपिया घना लागी गिया.. इ पंच तो घी यूँ डकारी गिया जू राबड़ी पि रिया वे…” तो माहौल में ठहाका गूँज उठता है.

बात राबड़ी की निकली तो दूर तलक जायेगी…

बचपन में सुना करते थे कि अगर सुबह सुबह एक बड़ा कटोरा भरके देसी मक्की की राब पी ली जाये तो दोपहर तक भूख नहीं लगती. जो लोग गाँव से ताल्लुक रखते है, उन्हें वो दृश्य ज़रूर याद आता होगा, जब आँगन के एक कोने में या छत पर जल रहे चूल्हे पर राबड़ी के  तोलिये (काली बड़ी मटकी,जिसे चूल्हे पर चढ़ाया जाता था)से भीनी भीनी खुशबु उठा करती थी और घर के बुज़ुर्ग चिल्लाते थे.. “अरे बराबर हिलाते रहना, नहीं तो स्वाद नि आएगा.” और देसी लफ़्ज़ों में कहे तो “राब औजी जाई रे भूरिया” ..
वो भी गजब के  ठाठ थे राबड़ी के, जिसके बिना किसी भी समय का भोजन अधूरा माना जाता था. मक्की की उस देसी राब का स्वाद अब बमुश्किल मिल पाता है. होटलों में राब के नाम पर उबले मक्की के दलिये को गरम छाछ में डालकर परोस देते है.
“दाल बाटी चूरमा- म्हारा काका सुरमा “
चूल्हे पर चढ़ी राब और निचे गरम गरम अंगारों पर सिकती बाटी. नाम सुनने भर से मुह में पानी आ जाता है. पहले देसी उपलों के गरम अंगारों पर सेको, फिर गरम राख में दबा दो.. बीस-पच्चीस मिनट बाद बहार निकाल कर.. हाथ से थोड़ी दबाकर छोड़ दो घी में..  जी हाँ, कुछ ऐसे ही नज़ारे होते थे चंद बरसों पहले.. अब तो बाफला का ज़माना है. उबालो-सेको-परोसो.. का ज़माना जो आ गया है. अब घर घर में ओवन है, बाटी-कुकर है. चलिए कोई नहीं. स्वाद वो मिले न मिले..बाटी मिल रही है, ये ही क्या कम है !!
अब शहर में कही भी उस मेवाडी अंदाज़ का दाल-बाटी-चूरमा नसीब नहीं. एक-आध रेस्टोरेंट था तो उन्होंने भी क्वालिटी से समझौता कर लिया. कही समाज के खानों में बाटी मिल जाये तो खुद को खुशकिस्मत समझते हैं. और हाँ, बाटी चुपड़ने के बाद बचे हुए घी में हाथ से बने चूरमे का स्वाद… कुछ याद आया आपको !
आधी रात को उठकर जब पानी की तलब लगती है तो दादी का चिर परिचित अंदाज़ सुनने को मिलता है.. “बाटी पेट में पानी मांग री है”  चेहरे पर मुस्कान आ जाती है.

“मैं मेवाड़ हूँ.”
मोतीमगरी पर ठाठ से विराजे महाराणा प्रताप सिंह जी, चेटक सर्किल पर रौब से तीन टांग पर खड़ा उनका घोडा चेटक… जगदीश मंदिर की सीढियाँ  चढ़ता फिरंगी और अंदर जगन्नाथ भगवान के सामने फाग गाती शहर की महिलाएं.. गणगौर घाट के त्रिपोलिया दरवाज़े से झांकती पिछोला.. नेहरु गार्डन में मटके से पानी पिलाती औरत की मूर्ति, सहेलियों की बाड़ी मे छतरी के ऊपर लगी चिड़िया के मुह से गिरता फिरता पानी.. गुलाब बाग में चलती छुक छुक रेल, सुखाडिया सर्किल पर इतनी बड़ी गेहूं की बाली… लेक पेलेस की पानी पर तैरती छाया, दूर किसी पहाड़ से शहर को आशीर्वाद देती नीमच माता… जी हाँ ये हमारा उदयपुर है.
शहर की इमारतों का क्या कहना.. मेवाड़ के इतिहास की ही तरह ये भी भव्य है..अपने में एक बड़ा सा इतिहास समेटे हुए. पिछोला किनारे से देखने पर शहर का मध्य कालीन स्वरुप दिखता है. यूँ तो उदयपुर को कहीं से भी देखो,ये अलग ही लगता है पर पिछोला के नज़ारे का कोई तोड़ नहीं. एक तरफ गर्व से सीना ताने खड़ा सिटी पेलेस.. तो दूसरी तरफ होटलों में तब्दील हो चुकी ढेर सारी हवेलियाँ. जाने कितने राजपूतों के आन-बाण शान पर खड़ा है ये शहर..
शाम के समय मोती मगरी पर “साउंड और लाईट शो” चलता है. यहीं पर स्थित मोती महल में प्रताप अपने कठिनाई भरे दिनों में कुछ दिन ठहरे थे. खंडहरों पर जब रौशनी होती है और स्वर गूंजता है…”मैं मेवाड़ हूँ” तो यकीन मानिये आपका रोम रोम खड़ा हो जाता है. कुम्भा, सांगा, प्रताप, मीरा, पन्ना, पद्मिनी… जाने कितने नाम गिनाये… तभी माहौल में महाराणा सांगा का इतिहास गूँजता है. कहते ही उनका जन्म तो ही मुग़लों को खदेड़ने के लिए हुआ था. उनकी लहराती बड़ी बड़ी मूंछें,गहरे अर्थ लिए शरीर के अस्सी घाव, लंबा और बलिष्ठ बदन उनके व्यक्तित्व को और अधिक प्रभावशील बना देता था. और तभी मुझे मेरठ  के मशहूर वीर रस कवि “हरी ओम पवार” के वे शब्द याद आते है… ” अगर भारत के इतिहास से राजस्थान निकाल दिया जाये, तो इतिहास आधा हो जाता है.. पर राजस्थान से अगर मेवाड़ को निकाल दिया जाये, तो कुछ नहीं बचता !”

इसी बीच घूमते घूमते आप देल्ही गेट पहुच जाये और “भोला ” की जलेबी का स्वाद लेते लेते अगर आपको ये शब्द सुनने को मिल जाये.. ” का रे भाया..घनो हपड हापड जलेबियाँ चेपी रियो हे.. कम खाजे नि तो खर्-विया खावा लाग जायगा.” तो यकीन मानिये आप ने शहर को जी लिया… वैसे उदयपुर निहायत ही खूबसूरत शहर है, और जब हम इसकी जुबान, खान पान की  बात छेड़ देते है तो बहुत कुछ आकर्षक चीज़ें हमसे छूट जाती है..