शहर के पहले मानव निर्मित मियावाकी जंगल की शुरुआत

उदयपुर: इस रविवार 6 साल से पर्यावरण के लिए कार्यरत पुकार फ़ाउंडेशन ने अपना 250वां रविवार हरित 250 के रूप में समर्पित किया। जिला शिक्षा अधिकारी उदयपुर व बंदूकवाला परिवार के सहयोग से संस्थान ने जिला शिक्षा अधिकारी मुख्यालय के परिसर में करीबन 100 वर्ग मीटर क्षेत्र में जापानी विधि “मियावाकी” द्वारा शहर का पहला मानव निर्मित मियावाकी जंगल का निर्माण करने के लिए 351 पौधों का पौधरोपण किया गया जिसमें शहर के सभी वर्ग, क्षेत्र, व्यवसाय के 150 से अधिक लोगों ने स्वेच्छापूर्वक और पूरे उत्साह के साथ पौधरोपण कर श्रमदान किया। विशेषकर नमो विचार मंच के प्रदेशाध्यक्ष प्रवीण रतलीया, ग्वालियर से रोहित उपाध्याय, जर्मनी से फ्रैंक, आयुर्वेदिक विशेषज्ञ शोभालाल औदिच्य, मोइनी फ़ाउंडेशन, नाट्यान्श संस्थान, मर्सी लीग, उदयपुर ब्लॉग, ठालागिरी, दिया संस्थान, ब्लीस फ़ाउंडेशन, रॉबिन हूड आर्मी, आबु टाइम्स, नितांदु इवैंट की भागदारी रही।

मियावाकी विधि क्या है? – संस्थापक भुवनेश ओझा ने बताया कि यह नाम जापानी पर्यावरणविद् अकीरा मियावाकी के नाम पर रखा गया है जिन्होने इस विधि को ईजाद किया है जिससे प्राकृतिक रूप से 100 सालों में बनने वाले जंगल को 10 साल में ही बनाया जा सकता है। यह जंगल 30 गुना ज्यादा घने होते हैं जिससे कार्बन डाइऑक्साइड व हानिकारक सूक्ष्म कणों को यह सोखते है जो प्रदूषण कम करने का असरदार हल है। इस विधि के तहत विश्वभर में कहीं भी जंगल लगाना संभव है।

अरावली के पैतृक पौधों का रोपण – संस्था के सदस्य आशीष बृजवासी ने बताया कि पौधरोपण के दौरान इस बात का विशेष ध्यान रखा गया कि केवल अरावली पर्वतमाला के विलुप्त होते पैतृक पौधे जैसे रोंझ, कोटमबड़ी, पिलखन, गूँदी व गुग्गल साथ ही राज्य का राजकीय वृक्ष खेजड़ी व इन्हीं के साथ अन्य 37 प्रजातियों के 351 पौधों को लगाये गए।

दो साल तक करेंगे रखरखाव – मुख्य जिला शिक्षा अधिकारी शिवजी गौड़ ने बताया कि प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारी को समझते हुए संस्थान द्वारा यह एक अभिनव पहल है। पौधों का नियमित रूप रखरखाव जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय एवं पुकार संस्थान द्वारा कम से कम दो वर्ष तक किया जाएगा ताकि आने वाले समय में यह वृक्ष बनकर जैव विविधता में सुधार लाएँगे।

 

हिंदी दिवस विशेष – उदयपुर के कवि और हिंदी भाषा से जुड़े कुछ तथ्य

 

“जिस देश को अपनी भाषा और साहित्य के गौरव का अनुभव नहीं है, वो उन्नत राष्ट्र नहीं हो सकता“ – डॉ राजेंद्र प्रसाद

 

14 सितम्बर यानी आज का दिन हिंदी दिवस के रूप में मनाया जा रहा है । 14 सितम्बर, 1949 के दिन ही यूनियन ने हिंदी को अपनी अधिकारिक भाषा घोषित किया था । इस महत्वपूर्ण अवसर पर हम आप लोगो के सामने उदयपुर के ख्यातनाम कवि श्री नंद चतुर्वेदी और रति सक्सेना द्वारा लिखित दो कविता लेकर आये है ।

ये तो हम सभी जानते ही है कि मेवाड़ की धरती ने अनेक कवियों और लेखकों को जन्म दिया है पर नंद चतुर्वेदी एवं रति सक्सेना की कवितायें न केवल आपको अपना संसार बनाने की छूट देंगी लेकिन साथ ही साथ उनकी ये कविता अंत में एक संदेश भी ज़रूर दे जाती है ।

आप खुद पढ़ कर मज़ा लीजिये ।

  1. नन्द चतुर्वेदीNand_Chaturvedi

प्रेम के बारे में

हवा से मैंने प्रेम के बारे में पूछा

वह उदास वृक्षों के पास चली गयी

सूरज से पूछा

वो निश्चिन्त चट्टानों पर सोया रहा

चन्द्रमा से मैंने पूछा प्रेम के बारे में

वो इंतज़ार करता रहा लहरों और लौटती हुई पूर्णिमा का

पृथ्वी ही बची थी

प्रेम के बारे में बताने के लिए

जहाँ मृत्यु थी और ज़िन्दगी

सन्नाटा था और संगीत

लड़कियाँ थी और लड़के

हजारों बार वे मिले थे और कभी नहीं

समुद्र था और तैरते हुए जहाज

एकांत था और सभाएं

प्रेम के दिन थे अनंत

और एक दिन था

यहाँ एक शहर था सुनसान

और प्रतीक्षा थी यहाँ जो रह रहे थे

वो कहीं चले गये थे

थके और बोझा ढोते

जो थक गये थे लौट आये थे

यहाँ राख थी और लाल कनेर

प्रेम था और हाहाकार ।

  1. रति सक्सेनाrati saxena

भले घर की लडकियाँ

 

भले घर की लडकियाँ

पतंगें नहीं उडाया करतीं

पतंगों में रंग होते हैं

रंगों में इच्छाएँ होती है

इच्छाएँ डँस जाती है

 

पतंगे कागजी होती है

कागज फट जाते है

देह अपवित्र बन जाती है

पतंगों में डोर होती है

डोर छुट जाती है

राह भटका देती है

 

पतंगों मे उडान होती है

बादलों से टकराहट होती है

नसें तडका देती हैं

तभी तो

भले घर की लड़कियाँ

पतंगे नहीं उड़ाया करतीं ।

 

 

अब हम आपको हिंदी भाषा से जुड़ी कुछ मजेदार बातों के साथ छोड़ जाते हैं :-

  • हिंदी को अपना नाम पर्शियन शब्द ‘हिन्द’ से मिला ।
  • हिंदी में छपी पहली किताब ‘प्रेम सागर’ मानी जाती है । इसे लल्लू लाल ने 1805 में लिखा था । ये किताब भगवान् श्री कृष्णा के दिए संदेशों पर आधारित थी ।
  • 1881 में बिहार ने उर्दू की जगह हिंदी को अपनी अधिकारिक राज्यीय भाषा का दर्जा दिया । हिंदी भाषा को अपनाने वाला वो भारत का पहला राज्य बना ।
  • ‘समाचार सुधावर्षण’ पहली हिंदी दैनिक पत्रिका थी, जो 1854 में कलकत्ता से शुरू हुई ।
  • हिंदी भारत के आलावा मॉरिशस, फिजी, सूरीनाम, गुयाना, त्रिनिदाद एंड टोबेगो और नेपाल में भी बोली जाती है ।
  • आज की तारीख में करीब 500 मिलियन लोग हिंदी बोलते है या जानते है ।
  • पहला हिंदी टाइपराइटर 1930 में आया ।
  • हिंदी उन सात भाषाओँ में शामिल है जो वेब एड्रेस बनाने के काम आती है ।
  • हिंदी और उर्दू को समानताओं के कारण एक दुसरे की बहन माना जाता है ।

 

तो है न हिंदी मजेदार भाषा!!! भाई अंग्रेजी अपनी जगह है । पर जो मज़ा हिंदी बोलने और सुनने में आता है वो किसी और भाषा में कहाँ ?

खैर कवितायें और भी थी आपके साथ साझा करने को पर फिर हमने सोचा कि आज आप लोग आपकी अपनी पसंद की हिंदी कविता या कहानी कमेंट कर उदयपुर के लोगो तक पहुचायें । इसी बहाने शहर के लोगो को हिंदी को और करीब से जानने का मौका मिल जायेगा और साथ ही साथ नई-नई कवितायें पढने को भी मिल जाएगी ।

 

आज हिंदी दिवस को इसी तरह कुछ ख़ास बनाते है । हमने तो दो कवितायें लिख भेजी है, अब आप लोगों की बारी है …

देव उत्थापनि एकादशी

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विश्व का भरण पोषण करने वाले भगवान् विष्णु वैसे तो क्षण भर का भी विश्राम नहीं करते ,किंतु भारतीय संस्कृति ने देह एवं देव में विभेद न करते हुए समग्र पूजन-अर्चन-वंदन को एक सूत्र में आचरण के लिए निर्देशित किया है-” यथा देहे तथा देवे ” अर्थात जिस प्रकार हम शरीर(देह) का प्रतिदिन स्नान , भोजन , वस्त्राभरण , शयन व जागरण का विधान करते है, उसी प्रकार देवताओं को भी पूजा में स्नानार्थ जल , भोजन हेतु नैवैद्य  (प्रसाद)  एवं वस्त्र-आभरण में श्रृंगार  आदि समर्पित करते है। विष्णु हमारे ह्रदय में निवास करते है ,”हृदये विष्णुं ध्यायते “।

ह्रदय एक क्षण के लिए भी  विश्राम नहीं लेता , किन्तु वैज्ञानिक तथ्य है कि ‘ लुब-डब ‘ की ध्वनि के बीच सैकंड से भी कम समय में ह्रदय विश्राम कर लेता है, कथा है कि –
भाद्रपद मास कि शुक्ल एकादशी को शंखासुर नाम के राक्षस से संग्राम करते हुए विष्णु  भगवान ने उसका वध कर दिया , तदुपरांत अत्यधिक  परिश्रम से हुई थकान दूर करने के लिए विष्णु क्षीर सागर में शयन करने लगे । क्षीर सागर में चार माह तक शयन के उपरांत कार्तिक शुक्ल एकादशी को भगवान विष्णु शयन त्यागकर जागृत हुए । इसी भावना से इस एकादशी को देवोत्थापनी एकादशी या प्रबोधिनी एकादशी से संबोधित किया जाता है । सामाजिक संस्कारो का आज से शुभारंभ हो जाता है।

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विवाह आदि शुभ कार्य प्रारंभ होने लगते है, वस्तुतः ग्रीष्म एवं वर्षा ऋतु में अत्यधिक ऊष्मा एवं जलप्लावन ,  आंधी , तूफ़ान आदि मौसम से होने वाली आपदाएं शांत होने से, क्षीत ऋतु  के आगमन से प्राणियों में उर्जा एवं शक्ति का संचार होने लगता है जिससे हम अपने कार्यों को, कामनाओं को पूरा करने में  तन-मन से सक्षम हो जाते है। नए धान्य की उपज से प्राप्त आर्थिक संसाधन भी हमें प्राप्त हो जाते है , अतः देव प्रबोधिनी के पश्च्यात शुभ कार्यो के लिए मुहूर्त बताये जाते है।

इसी दिन तुलसी विवाह की भी परम्परा मनुष्य जाती की वनस्पतियों के प्रति सजीव भावना की परिचायक है । तुलसी को एक पौधा न मानकर जीवन रक्षक, तथा हमारी रोग-प्रतिरोधक क्षमता को बढाने वाली वनस्पति के रूप  में  देखा  जाता  है।   तुलसी को विष्णु की प्रेयसी के रूप में सम्मानित  कर शालिग्राम स्वरुप से तुलसी विवाह करवाकर अपनी कृतज्ञतामयी भावनाएं समर्पित की जाती है।

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देवाराधन के ये विशिष्ट प्रयोजन परंपरा के रूप में  ऋषियों- मुनियों  ने   समाज की समृद्धि एवं सुखी जीवन के लिए निर्धारित किये हैं जो उत्कृष्ट मानवीय सभ्यता एवं संस्कृति के द्योतक हैं, परिचायक हैं-

          ” सर्वे भवन्तु सुखिनः 
             सर्वे सन्तु निरामयाः”

 

Article By : Dr. Pramod Kumar Sharma

 

मौसम ने ली अंगड़ाई

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आज दोपहर में बाज़ार निकला, आदतन अच्छा खासा स्वेटर डाल कर और सच मानिये धूप ने पसीने छुड़ा दिए। वापस घर आ कर चैन की सांस ली और थोड़े वक़्त में फिर से नार्मल हुआ। गर्मी के मौसम की दस्तक होने लगी है। दिन में धुप सताने लगी है और रात में सर्दी का आलम बरक़रार रहता है। गर्मी की आहट  हर ओर से सुनाई दे रही है। सूर्य देव के तेवर थोड़े रूद्र हुए हैं, दिन में प्यास अब ज्यादा लगने लगी है, सरसों पर पीले फूलों की कोंपले फूटने लगी हैं, पेड़ पौधे अपना कलेवर बदलने की तैयारी कर रहे हैं। पेड़ों की शाख से पत्ते गिरने लगे हैं जो पतझड़ के आने का संकेत है। प्रकृति अपनी ओर  से  हर संभव सन्देश देने का प्रयास कर रही है के – उठो जागो एक नया सवेरा हुआ है नए मौसम के रूप में।

अभी पूरी तरह से निश्चिन्त होने की आवश्यकता नहीं है, अभी लापरवाही ठीक नहीं। अभी सिर्फ शुरुआती दौर है मौसम के बदलने का, अभी थोडा इंतज़ार और कीजिये और फिर बेफिक्र हो कर घर से बहार निकलिए। अगर अभी बाहर आना जाना होता है तब भी गर्म कपड़ों को अलग मत रखिये। यह बीमार करने वाले हालात हैं। रोज़ समाचारों में आ रहा है स्वाइन फ्लू फिर से सक्रिय हो रहा है। आज भी समाचार पत्र में पढ़ा दो और स्वाइन फ्लू पॉजिटिव मरीज़ अस्पताल में दाखिल हुए हैं। सजगता, सतर्कता और सक्रियता अभी बेहद ज़रूरी है। जहाँ एक ओर मौसम करवट बदल रहा है वहीँ दूसरी ओर बीमारियाँ अपने पैर पसार रही हैं इसलिए अब पहले से ज्यादा सावधान रहिये।

नए मौसम के आने पर हमारी दिनचर्या पर भी इसका प्रभाव पड़ता है। जहाँ सर्दी के मारे जो काम दूभर थे वो अब हम सहज ही कर सकते हैं मसलन सुबह की सैर। पतझड़ के आने से लोगो की व्यस्तता और बढ़ेगी जिनके घर में पेड़ पौधों की बहुतायत है। रोज़ ढेरो पत्तियों का अम्बार लग जायेगा जिसे रोज़ साफ़ करना अपने आप में बहुत बड़ा काम होगा। इस समय बड़े पेड़ों की छटनी की जा सकती है। बरसात के मौसम में वे स्वत: ही अपने पुराने रूप में दिखने लगेंगे साथ ही रोज़ रोज़ की साफ़ सफाई से भी थोड़ी रहात मिलेगी।

दुपहिया वाहन चालकों के लिए परेशानी शुरू हो गयी है। नहीं समझे? अरे भाई सरसों के फूलों के साथ साथ चेंपा भी तो आने लगता है। और दुपहिया वाहन चालकों को उसने परेशान करना शुरू कर दिया है। हाँ अभी थोडा कम है मगर अब धीरे धीरे यह भी बढ़ेगा। प्रकृति का जीवन चक्र तो यूहीं चलता रहेगा और इसके साथ साथ हम भी। जब चेंपा अलविदा कहेगा तब मच्छर मक्खियाँ लौट आयेंगे। हिट, आल आउट इनका मार्किट भी तो है। इधर कीड़े मकोड़े शुरू और उधर इन्हें मार भगाने की कवायद शुरू। अभी फिलहाल पंखे, कूलर साफ़ कर लीजिये अपने ए सी को दुरुस्त करवा लीजिये। ना ना अभी चलाइयेगा बिलकुल नहीं, वर्ना लेने के देने पड़ सकते हैं।लीजिये ए सी के नाम से याद आया, इधर पंखे, कूलर  ए सी  शुरू हुए नहीं की बिजली की खपत बढ़ेगी और लौट आयेंगे दिन कमबख्त बिजली कटौती के। आप सोच रहे होंगे की किस क़यामत को याद कर लिया। दोस्तों सही कहूं तो मुझे भी अभी से से सोच कर बहुत बुरा लग रहा है की बिन बिजली कैसी हालत होती है। सब काम रुकते हैं सो अलग गर्मी में बेहाल होना पड़ता है और सहन करना तो बाप रे बाप! इस पंखे कूलर की बात से बात याद आ गयी वर्ना बिजली कटौती तो मैं भूल ही गया था।

खैर दोस्तों जो होना है सो होगा। परिवर्तन आते हैं और आते रहेंगे। ये हमारी ज़िम्मेदारी है की इस परिवर्तन को हम किस प्रकार से अपनाते हैं। सहज रहें और समय रहते अपने सभी काम पूरे करें। खान पान,पहनावा, साफ़ सफाई बस इन छोटी छोटी बातों का ध्यान रखें और प्रकृति के इस अनमोल उपहार को सहर्ष स्वीकार करें। जिस प्रकार परिवर्तन हमारे जीवन में ज़रूरी है ठीक उसी प्रकार से धरती पर मौजूद हर तत्व के लिए भी ये नितांत आवश्यक है। आइये इस परिवर्तन का तहे दिल से स्वागत करें।

Image Credits: indian-escape.in

उदयपुर और सर्दी का मौसम

winter and cold in udaipur
समूचा उत्तर भारत कड़ाके की सर्दी और शीतलहर की चपेट में है। श्रीनगर से लेकर अमृतसर, दिल्ली, हिसार, जयपुर, लखनऊ और ग्वालियर सभी जगह सर्दी का प्रकोप नाक में दम किये हुए है। वैसे उदयपुर में भी सर्दी बेहद कहर ढा रही है। अल सुबह या शाम को सूरज ढलने के बाद तो घर से निकलना गुनाह के समान हो गया है। सर्दी की इस चपेट से मैं स्वयं भी नहीं बच पाया हूँ। सर्दी खाँसी ज़ुकाम से बेहाल होने के बाद घर बैठ कर मफलर लपेट कर और रजाई में दुबक कर रिपोर्टिंग करने का सौभाग्य विरले लोगों को ही नसीब होता है।

सर्दी ने लोगो की दिनचर्या के साथ साथ उनकी बोली भी बदल दी है। प्राय शांत रहने वाले भी किट किट करते नज़र आ रहे हैं। भगवान् को सुबह शाम याद करने वाले अब तो सारा दिन ॐ नमः शिवाय का जाप करते दिखते हैं, सर्दी के मारे। कुछ तो रशियन और स्पेनिश भी बोलते दिख रहे हैं। देखते जाइये ये सर्दी अभी और क्या क्या गुल खिलाती है। माफ़ कीजियेगा कमबख्त तबियत ख़राब होने की  वजह से रुमाल की ज़रूरत आन पड़ी है। यही तो रखा था, किधर गया?

इस सर्दी ने हमारी क्रिकेट टीम को भी नहीं बक्शा, उन्होंने भी आज (06 जनवरी 2013) के मैच में  जल्दी जल्दी आउट हो कर फटाफट पवेलियन में जा कर बैठने में ही अपनी भलाई समझी। वैसे हमारे खिलाड़ियों  ने सीरीज का अंतिम मैच जीत कर भारतीय टीम के खेमे में जीत की गर्मी ला दी है। आज सर्दी से बचने का इंतज़ाम कर लिया है हमारे कप्तान धोनी ने। आपकी तैयारी भी शायद कुछ ऐसी ही होगी।

लेकिन मैं बच्चों की हरकते देख कर हैरान हूँ, चाहे सर्दी कितनी ही क्यों न पड़ रही हो उनकी खेलने कूदने की क्षमता ज्यूँ की त्यूँ बरकरार बनी हुई है। बच्चों में बड़ो के मुकाबले बहुत ऊर्जा भरी होती है, अपनी इस ऊर्जा का उपयोग उन्हें कहीं न कहीं तो करना ही होता है। उदयपुर प्रशासन ने फिलहाल आठवी कक्षा तक के बच्चों के लिए अवकाश घोषित कर दिया है और उनको इस कडकडाती ठण्ड से निजात दिलाने की चेष्टा की है। चलिए आप और मैं प्रार्थना करते हैं की सर्दी पड़े मगर इसका प्रकोप इतना न हो की बच्चों को स्कूल भेजने के लिए सोचना पड़े।

यदि उदयपुर की बात करें तो बेशक मौसम विभाग का तापमापी बिंदु 4 डिग्री सेल्सियस पर अटका हो मगर यहाँ की कई जगहों पर तापमान बर्फ जमाने की कगार तक गिर गया है। आज ही के समाचार पत्र में फतेहपुरा के निकट बाहर खड़ी  कार की तस्वीर देखी जिस पर बर्फ जमी थी। इसी तरह यूनिवर्सिटी कैंपस और गुलाब बाग़ भी बेहद ठन्डे हैं। कहिये इतने ठन्डे मौसम में ऐसी जगह घूमने का खयाल भी आपके शरीर में सिरहन पैदा करने के लिए काफी है। फिर भी आप अगर माद्दा रखते हैं, तो बेशक घूमें आखिर शहर है आपका। और अगर आपकी इस बात पर कोई टोके तो आप बेहिचक कह सकते हैं “हाँ मैं क्रेजी हूँ”

तो उदयपुर वासियों लग रहा है ग्लोबल वार्मिंग जैसे ग्लोबल कूलिंग में तब्दील हो गयी है। खैर ये जो भी हो हम पर्यावरण के प्रति सचेत हो रहे हैं और उसका असर भी हमें समय रहते आज या कल कभी न कभी दिखेगा ज़रूर। फिलहाल इतनी सर्दी के मौसम में आप अपना खयाल रखें, सावधानी बरतें और खासकर बच्चों का विशेष ध्यान रखें। वैसे सरकार सर्दी से बचाने के लिए ग़रीब लोगों के लिए रैन बसेरे बनवाती है। आप भी अपने पुराने ऊनी कपड़े इत्यादि ज़रुरात्मंदो को देकर कुछ पुण्य का कार्य कर सकते हैं। आज की सर्दी के लिए फिलहाल इतना ही। आगे की सर्दी के लिए विशेष समाचार के लेकर हम आपकी सेवा में हाज़िर रहेंगे।

किट किट किट ………..
Image Credits: Wexas.com

लोकदेवता सगसजी – Local Deity Sagas Ji

सगसजी – Sagas Ji

sagas ji bawji udaipur

मेवाड़ – महाराणा राजसिंह (1652-1680) बड़े पराक्रमी, काव्य- रसिक और गुणीजनों के कद्रदान थे साथ ही बड़े खूखार, क्राधी तथा कठोर हृदय के भी थे। इनका जन्म 24 सितम्बर, 1629 को हुआ। इन्होंने कुल 51 वर्श की उम्र पाई। इनके आश्रय में राजप्रषस्ति, राजरत्नाकर, राजविलास एवं राजप्रकाष जैसे महत्वपूर्ण ग्रंथ लिखे गये।

राजसमंद जैसी बड़ी कलापूर्ण एवं विषाल झील का निर्माण कराने का श्रेय भी इन्ही महाराणा को है। इसकी पाल पर, पच्चीस षिलाओं पर राज – प्रषस्ति महाकाव्य उत्कीर्ण है। 24 सर्ग तथा 1106 ष्लोकों पर वाला यह देष का सबसे बड़ा काव्य-ग्रंथ है।
महाराणा राजसिंह ने मेवाड़ पर चढ़ आई, बादषाह औरंगजेब की सेना का बड़ी बहादुरी से मुकाबला किया और उसे तितर-बितर कर बुरी तरह खदेड़दी। इनके तीन पुत्र हुए। सबसे बड़े सुल्तानसिंह, फिर सगतसिंह और सबसे छोटे सरदारसिंह। इनके कुल आठ रानियां थी। सबसे छोटी विचित्रकुंवर थी। यह बीकानेर राजपरिचारकी थी।

विचित्र कुंवर बहुत सुन्दर थी। महाराणा राजसिंह ने उनके सौंदर्य की चर्चा सुनी हुई थी। अतः महाराणा द्वारा विचित्र कुंवर से षादी का प्रस्ताव भिजवाया गया। महाराणा ने प्रस्ताव अपने लिए भिवाया था किन्तु बीकानेर वाले इसे कुंवर सरदार सिंह से विवाह काप्रस्ताव समझते रहे कारण कि विचित्र कुंवर उम्र में बहुत छोटी थी। सरदारसिंह उससे मात्र तीन वर्श बड़े थे।

विवाहपरान्त विचित्र कुंवर और सरदारसिंह का सम्बन्ध माॅं – बेटे के रुप में प्रगाढ़ होता गया। अधिकांष समय दोनों का साथ- साथ व्यतीत होता। साथ – साथ भोजन करते, चैपड़ पासा खेलते और मनोविनोद करते। इससे अन्य को ईश्र्या होने लगी, फलस्वरुप महलों में उनके खिलाफ छल, प्रपंच एवं धोखा, शड़यंत्र की सुगबुगाहट षुरु हो गई। मुॅंह लगे लोग महाराणा के कान भरने लग गये।

इन मुॅंहलगों में उदिया भोई महाराणा का प्रमुख सेवक था। उसे रानी विचित्र कुवंर और राजकुमार सरदारसिंह का प्रेम फूट िआॅ।ख भी नहीं दंखा गया। वह प्रतिदिन ही उनके खिलाफ महाराणा को झूठी मूठी बातें कहकर उद्वेलित करता। कई तरह के अंट संट आरोप लगाकर उन्हें लांछित करता। यहां तक कि दोनों के बीच नाजायज संबन्ध जैसी बात कहने में भी उसने तनिक भी संकोच नहीं किया। इससे महाराणा को दोनों के प्रति सख्त नफरत हो गई।
एक दिन उदिया ने अवसर का लाभ उठाते हुए महाराणा से कहा कि अन्नदाता माॅं – बेटे की हरकतें दिन दूनी बढ़ती जा रही है। जब देखो तब हॅंसी ठट्ठा करते रहते है। साथ – साथ खेलते रमते है। साथ – साथ् भोजन करते है और साथ – साथ सो भी जाते है। यह सब राजपरिवार की मर्यादा के सर्वथा प्रतिकूल है जो असह्य है और एक दिन बदनामी का कारण सिद्ध होगा।
Sagas Ji Bavji in Udaipur मुॅंहलगे उदिया का यह कथन महाराणा राजसिंह के लिए अटूट सत्य बन गया। उन्होंने जो कुछ सुना-देखा वह उदिया के कान – आॅंख से ही सुना देखा अतः मन में बिठा लिया कि रानी और कुंवर के आपसी सम्बन्ध पवित्र नहीं है। गुस्से से भरे हुए महाराणा ने उदिया को कहा कि कुंवर को मेरे समक्ष हाजिर करो।

प्रतिदिन की तरह कुंवर ग्यारह बजे के लगभग यतिजी से तंत्र विद्या सीखकर आये ही थे। फिर भोजन किया और रानीजी के कक्ष में ही सुस्ताने लगे तब दानों को नींद आ गई। उदिया के लिए दोनों की नींद अंधे को आॅंख सिद्ध हुई। वह दोड़ा – दोड़ा महाराणा के पास गया और अर्ज किया कि रानीजी और कुंवरजी एक कक्ष में सोये हुए है, हुजूर मुलाइजा फरमा लें। उदिया महाराणा के साथ आया और रानी का वह कक्ष दिखाया जिसमें दोनों जुदा – जुदा पलंग पर पोढ़े हुए थे।

महाराणा का षक सत्य में अटल बन रहा था। उदिया बारी – बारी से पांच बार कुवंर को हजुर के समक्ष हाजिर करने भटकता रहा पर कुंवर जाग नहीं पाये थे। छठी बा रवह जब पुनः उस कक्ष में पहुॅंचा तो पता चला कि कुंवर समोर बाग हवाखोरी के लिए गये हुए है। उदिया भी वही जा पहुंचा और महाराणा का संदेष देते हुए षीघ्र ही महल पहुंचने को कहा।

कुंवर सरदारसिंह बड़े उल्लासित मन से पहुॅंचे किन्तु महाराणा के तेवर देखते ही घबरा गये और कुछ समझ नहीं पाये कि उनके प्रति ऐसी नाराजगी का क्या कारण हो सकता है। महाराणा ने कुंवर की कोई कुषलक्षेेम तक नहीं पूछी और न ही मुजरा ही झेल पाये बल्कि तत्काल ही पास में रखी लोहे की गुर्ज का उनके सिर पर वार कर दिया। एक वार के बाद दूसरा वार और किया तथा तीसरा वार गर्दन पर करते ही सरदारसिंह बुरी तरह लड़खड़ा गये।

राजमहल के षंभु निवास में यह घटना 4.20 पर घटी। यहां से कुंवर सीधे षिवचैक में जा गिरे। भगदड़ और चीख सुनकर राजपुरोहित कुलगुरु सत्यानन्द और उनकी पत्नी वृद्धदेवी दौड़े – दौड़े पहुॅंचे। कुंवर की ऐसी दषा देख दोनों हतप्रत हो गये। वृद्ध देवी ने अपनी गोद में कुंवर का सिर रखा और जल पिलाया। प्राण पखेरु खोते कुंवर ने कहा – मैं जा रहा हूॅं। पीछे से मेरी डोली न निकाली जाय। मुझे षैय्या पर ही ले जाया जाय यही हुआ। महाराणा तो चाहते भी यही थे कि उनकी दाहक्रिया भी न की जाय किन्तु कुल गुरु और गुरु पत्नी ने सोचा कि चाहे राजपरिवार से कितना ही विरोध लेना पड़े और किन्तु राजकुमार की षव यात्रा तो निकाली जाएगी।

षवयात्रा आयड़ की पुलिया पर पहुॅंची। वही पुलिया के चबूतरे पर अर्थी रखी गई । इतने में पास ही में निवास कर रहे यतिजी को किसी ने राजकुमार सरदारसिंह के नहीं रहने की सूचना दी। यतिजी को इस पर तनिक भी विष्वास नहीं हुआ कारण कि सुबह तो राजकुमार उनके पास आये थे।

यह यति चन्द्रसेन था जो बड़ा पंहुचा हुआ तांत्रिक था। इसके चमत्कार के कई किस्से जनजीवन में आज भी सुनने को मिलते है। राजकुमार भी इनसे कई प्रकार की तंत्र विद्या में पारंगत हो गये थे। यहां तक कि उन्होंने स्वयंमेव उड़ाने भरने की कला में महारत हासिल कर ली थी। दौड़े – दौड़े यतिजी वहां आये । कुंवर को अपने तंत्र बल से जीवित किया। दोनों कुछ देर चैपड़ पासा खेले। उसके बाद यतिजी बोले अब अर्थी वर्थी छोड़ो और पूर्ववत हो जाओ। इस पर राजकुमार बोले नहीं जिस दुर्गति से मैं मृत्यु को प्राप्त हुआ, अब जीना व्यर्थ है। इस पर यति ने पानी के छींटे दिये और कुंवर को मृत किया। आयड़ की महासतिया जी में राजकुमार का दाह संस्कार किया गया। कहते है कि इस घटना से राजपुराहित दंपत्ति का मन ग्लानि से भर गया और जीवित रहने की बजाय दोनों ही कुंवर की चिता में कूद पड़े।

उधर जब राजकुमार सरदारसिंह के निधन के समाचार बीकानेर की रानी विचित्र कुंवर को मिले तो वह अपने हाथ में नारियल लेकर सती हो गई।
महाराणा राजसिंह के सबसे बड़े पुत्र सुल्तानसिंह की भी हत्या की गई । यह हत्या सर्वऋतु विलास में भोजन में जहर देकर की गई। यद्यपिइ स हत्याकंाड में महाराणा की कोई भूतिका नहीं थी। किन्तु उनके षासनकाल में होने और फिर हत्या करने वालों की काई खबर खोज नहीं की गई अतः इसका पाप भी उन्ही को लगा। उनके जीवनकाल में तीसरी हत्या उनके साले अर्जुनसिंह की की गई । ये मारवाड़ के थे और गणगौर पर सवारी देखने उदयपुर आए हुए थे। इनके बहिन रतनकुंवर थी जो राणाजी से विवाहित थी। ये करीब 35 वर्श के थे। जब सर्वऋतु विलास में घूम रहे थे कि सामने आता एक इत्र बेचने वाला दिखाई दिया । वह निराषा के भाव लिए था। अर्जुनसिंह से बोला महलो में गया किन्तु निराष ही लौटा। किसी मेरा इत्र नहीं लिया। लगा यहां के राणाजी इत्र के षौकीन नहीं है ष उन्हें अच्छे इत्र की पहचान नहीं है। अर्जुनसिंह को यह बात अखरी। उसने इसे मेवाड़ राज्य का अपमान समझा। म नही मन सोचा कि अच्छा यही हो, इसके पास जितना भी इत्र है, सबका सब खरीद लिया जाय ताकि यह समझे कि जो इत्र उसके पास है वैसा तो यहां के घोड़े पसंद करते है।

यह सोच अर्जुनसिंह ने उसे इत्र दिखाने को कहा । इत्र वाला दिखाता जाता और अर्जुनसिंह उसे अपने घोड़े की असाल में उड़ेलने को कहते।
ऐसा करते करते अर्जुनसिंह ने सारा इत्र खरीदकर , मुॅंह मांगी कीमत देकर मेवाड़ के गौरव की रक्षा की। किन्तु मुॅंह लगे लोगों ने इसी बात को विपरीत गति – मति से महाराणा के सामने प्रस्तुत करते हुए कहा कि अर्जुनसिंह कौन होते है जिन्होंने इस तरह का सौदा कर मेवाड़ की इज्जत एवं आबरु को मिट्टी में मिला दी। क्या मेवाड़नाथ का खजाना खाली है जो उन्होंने अपने पैसे से इत्र खरीदकर मेवाड़ को निचा दिखाया।

महाराणा को यह बात बुरी तरह कचोट गई। पीछोला झील में गणगौर के दिन जब नाव की सवारी निकली तो बीच पानी में षराब के साथ जहर दिलाकर महाराणा ने उनका काम तमाम कर दिया। वे चलती नाव में ही लुढ़क गये और उनके प्राण पखेरु उड़ गये। ये ही अर्जुन सिंह आगे जाकर गुलाब बाग की सुप्रसिद्ध बावड़ी के निकट प्रगट हुए और सगत्जी बने।

महाराणा राजसिंह ने उपुर्यक्त तीनों हत्याओं के लिए प्रायष्चित स्वरुप राजसमंद का निर्माण कराया, ब्रह्मभोज दिया तथा गोदान कराया।

 

महंत मिट्ठा लाल चित्तोड़ा
सागर जी शक्ति पीठ . दाता भवन 21
जोगपोल मंडी की नाल , उदयपुर
दूरभाष : 9414248195  [सुशील कुमार चित्तोड़ा]

 

Sagas Ji Bavji Udaipur

Source : Pratyush

[Fictional Letter] Teachers Day Special : “आपने डैडी की इतनी हेल्प क्यों की ?”

प्यारी सुशीला कोठारी जी,

पहले मैं आपको अपना इंट्रोडक्शन दे दूँ. मेरा नाम रिषित है. मैं 6 साल का हूँ, सनबीम स्कूल में पढता हूँ और उदयपुर में रहता हूँ. ये चिट्ठी मैं आपको छिप कर लिख रहा हूँ और पता नहीं कि आपतक मेरे ये छोटे छोटे अक्षर पहुंचेगे भी कि नहीं. पर मैं लिख रहा हूँ क्योंकि मैंने मेरे डैडी को पहली बार रोते हुए देखा है. वो मम्मा से कुछ कह रहे थे और बार बार आपका नाम ले रहे थे.

मैं आपको नहीं जानता. पर डैडी के मुँह से आपका नाम सुनकर आपमें मेरी जिज्ञासा बढ़ना कोई नयी बात नहीं थी. पिछले तीन दिनों की मेरी मेहनत रंग लायी और मेरी फ्रेंड दिशा के पापा, जो मेरे डैडी के स्कूल टाइम से फ्रेंड भी है, ने मुझे आपके बारे में बताया.

अब, आपके बारे में सब कुछ जानने के बाद मैं आपसे मिलना चाहता हूँ. मैंने आपको नहीं देखा, फिर भी दिशा के पापा के मुँह से आपके बारे में सुनने के बाद आपका पिक्चर मेरी आँखों में है. मैंने आपका चेहरा बना लिया है,जिसमे चश्मे के भीतर से झांकती आपकी आँखे मुझे रोजी मिस जैसी लग रही है. रोजी मिस मेरी क्लास टीचर है,जो मुझे बहुत प्यार करती है. पर जानना चाहता हूँ कि आपने डैडी की इतनी हेल्प क्यों की?

दादी ने बताया कि जब डैडी मेरी एज के थे, तब उनके डैडी यानी मेरे दादू भगवान के पास चले गए. जितने टॉय मेरे पास है, उतने टॉय से डैडी कभी नहीं खेले. उन्होंने इतनी चोकलेट्स भी नहीं खायी. और मेरी फेवरेट आइसक्रीम तो टेस्ट भी नहीं की. दादू नहीं थे तो उनको ये सब कौन लाकर देता ? मैं समझता हूँ. पर फिर से आपसे पूछ रहा हूँ, आपने डैडी की इतनी हेल्प क्यों की? मेरी रोज़ी मिस तो मुझे सिर्फ टॉफी देती है पर आपने डैडी को खूब सारी प्यारी प्यारी टेक्स्ट बुक्स दी थी. क्या उसमे छोटा भीम और डोरेमोन के फोटो भी थे ?

आपने डैडी के साथ रहकर उन्हें पोएम्स लिखना भी सिखाया. सच कहूँ, तो इस बात से मैं आपसे खफा हूँ. मुझे उनकी पोएम्स समझ में ही नहीं आती. वो बहुत बड़ी जो होती है.  पर दिशा के पापा बता रहे थे कि आप मेरे डैडी को खूब सारे कम्पीटिशन में ले कर जाती थी और उस से डैडी बड़े बड़े प्राइज जीतकर लाते थे. मेरे ड्राइंग रूम में वो सारी ट्रोफी’ज अभी भी शोकेस में पड़ी हुई है. डैडी को जब इंग्लिश में ट्यूशन की ज़रूरत हुई तो आपने किसी अरोड़ा सर को बोलकर उनसे डैडी को फ्री में ट्यूशन पढाने को भी बोला. ओह गोड! मैं तो स्कूल में ही पढ़-पढ़ कर थक जाता हूँ. डैडी तो उसके बाद भी ट्यूशन पढ़ने जाते थे !

दिशा के पापा ने मुझे बताया कि आप डैडी का स्कूल में बहुत खयाल रखती थी, बिलकुल रोज़ी मिस के जैसे या शायद उस से भी ज्यादा. आपके कारण ही डैडी ने केमिस्ट्री नाम के किसी सब्जेक्ट में सबसे ज्यादा नम्बर पाए. ये सब्जेक्ट मेरे कोर्स में नही है और आप भी मेरे पास नहीं. अगर मेरे भी ये सब्जेक्ट होता तो आपके बिना मैं उसमे पास कैसे होता ? एक बार जब स्कूल प्रिंसिपल ने डैडी को क्लास से बाहर निकाल दिया था तो आप उनसे लड़ पड़ी थी आपने तब तक लंच नही लिया था,जब तक कि प्रिंसिपल ने डैडी को माफ नहीं किया था.

क्यों लड़ती थी आप सब से डैडी के लिए? क्यों आप उनके लिए नई नई बुक्स लेकर आती थी? क्यों आपने उनको इतना आगे बढ़ने के अवसर दिए? क्यों आपने उनको इतने प्राइज दिलवाए? प्रिंसिपल से लड़ दी ? इसका उत्तर दिशा के पापा ने नहीं दिया, बोले कि मैं बहुत छोटा हूँ, नहीं समझूंगा.

कल मैंने आपके लिए एक प्यारा सा टॉय गिफ्ट लिया है. वो मैं आपको देना चाहता हूँ. मुझे आपका अड्रेस नहीं पता, दिशा के पापा को भी नहीं पता, बस उन्होंने इतना बताया कि आप सेक्टर पांच में कहीं रहती है ! मेरे डैडी से मैं नहीं पूछना चाहता. वो फिर से रोने लगेंगे. आपको ये चिट्ठी मिले तो प्लीज़ मुझसे मेरे स्कूल में आकर मिलना. मुझे आपसे खूब बातें करनी है और आपको रोज़ी मिस से भी मिलवाना है. आप आएँगी ना !!

आपका,

रिषित

(पत्र काल्पनिक है)

कृष्ण के विविध रंग सजे कृष्णाष्टमी पर

“नन्द के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की..!!”

“मुरली मनोहर श्री कृष्ण जी की जय..!!!”

कुछ ऐसे ही जयकारे आज पूरे देश ही नही अपितु पूरी दुनिया की फिज़ाओ में गुंजायमान हो रहे है जिनसे चारो ओर बस कृष्ण का ही नाम है, हर मुख पर कृष्ण की ही महिमा है, हर आँखों में कृष्ण की ही छवि है और हर कर्ण आज बस कृष्ण की मुरली की मधुर तानों को सुन रहे है… या यूँ कह ले की आज हर कोई कृष्ण के रंगों में रंगा हुआ…. और हो भी क्यों ना आज श्री कृष्ण जन्माष्टमी जो है; भादवा मास की कृष्ण पक्ष की वह मंगलमय अष्टमी  जब भगवान श्री कृष्ण देवकी और वासुदेव के नंदन के रूप में अवतारित हुए थे और उस घनघोर वर्षा वाली रात्रि में नन्द और यशोदा के घर भी अपार खुशियों की वर्षा कर दी थी…..

Jagdish_Mandir_Temple_Udaipur_Janmashtmi_2012

Shiv_Mandir_Sector_11_Udaipur_Janmashtmi_2012

कृष्ण के इन रंगों से हमारा उदयपुर कैसे अछूता रह सकता था… और जब नाथद्वारा और जगदीश मंदिर में कृष्णाष्टमी का रंग चढ़ता है तब के माहौल की छठा के तो क्या ही कहने… जगदीश मंदिर में सजी झांकी के दर्शन मध्यरात्रि में खुलते ही भक्तो का अम्बार लग गया, कान्हा के नाम के जयकारे गूंजने लगे और भगवन जगदीश की आरती कर उन्हें भोग लगाया गया और फिर भक्तो में प्रसाद बांटा गया. आज रात को दूध दही की हांड़ी को फोड़ने की प्रतियोगिता का आयोजन हुआ जिसमे सभापति रजनी डाँगी, प्रशांत अग्रवाल, हरीश राजनी  आदि अतिथि के रूप में शामिल हुए. बरसते हुए बादलों के बीच मटकी फोड़ने का आनंद दोगुना हो गया, हालांकि कुछ विलम्ब हुआ कार्यक्रम शुरू होने में पर फिर कलाकारों ने अपनी प्रस्तुतियों से वह मौजूद भक्तों का दिल जीत लिया . जगदीश चौक ॐ साईं राम ग्रुप ने झांकी सहित नृत्य प्रस्तुत किया. कृष्ण जन्मोत्सव में देश विदेश से आये  पर्यटकों ने लिया जमकर  आनंद . दीवाना ग्रुप के शाहनवाज़ [उदयपुर के बंटी] ने भजनों का ऐसा समां बंधा के वह उपस्तिथ लोग अपने आप को झूमने से नहीं रोक पाए, इन्द्र देव की कृपा बराबर भक्तों पे बनी रही उसी बीच दही हांडी फोड़ का कार्यक्रम शुरू हुआ , कुछ गीरे कुछ पड़े , फिर उठे फिर चढ़े और पूरी तरह उत्साहित होकर बार बार कोशिश की और फिर  चामुंडा ग्रुप, गोवेर्धन विलास से आई टोली  ने मटकी फोड़ी, जीतने वाले दल को Pacific University की तरफ से २१,००० रूपए नकद दिए  गए तथा ११००० रूपए का नकद पुरस्कार पंकज बोरना की तरफ से दिया गया.

Matki_Fod_Dahi_Haandi_Udaipur_Janmashtmi_2012

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पालनों में विराजित सजे-धजे लड्डू गोपाल, घरों के आँगन में बने नटखट बाल कृष्ण के नन्हे नन्हे कदम और साथ में रंगीली रंगोली, बरसते गुलाल और पानी की मार की बीच दही-हांड़ी और उसको फोड़ने के लिए ग्वालों की टोलियों में मची होड़ , कृष्ण जीवन की सजीली झाँकिया, रासलीला में सजता हुआ अलग ही संसार, दूध मलाई से बने पकवानों का भोग…. कितनी जीवन्तता है इस त्यौहार में, एक अलग ही हर्षो-उल्लास उमड़ता है; ठीक वैसा ही जैसा कृष्ण जी का जीवन था – कई रंगों को अपने में समेटे हुए, जीने की अदभुत कला सीखाने वाला और हर कठिन परिस्थिति से निकलने की राह दिखाने वाला. श्री कृष्ण जी में कुछ तो था जो उन्हें सबका चहेता बना देता है, हर किसी के दिल में बसते है वे – बच्चो के शरारती साथी, देवकी और यशोदा के लाल, वासुदेव और नन्द की आँखों के तारे, राधा के प्रिय, गोपियों के माखन चोर, सुदामा के मित्र और गोकुलवासियों के मन मोहन. उनका हर रूप उनके व्यक्तित्व का आईना था, हर आईने से अलग शिक्षा मिलती है.

Matki_Fod_Dahi_Haandi_Udaipur_Janmashtmi_2012

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दुर्घटना की प्रतीक्षा में

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Choga Lal Bhoi - Mewar Channel - Udaipur
छोगा लाल जी भोई [मेवाड़ चैनल] का सम्मान किया गया
Matki_Fod_Dahi_Haandi_Udaipur_Janmashtmi_2012

याद है उनकी नटखट शरारते – कैसे वे माखन चुराते थे, कभी गोपियों की मटकिया फोड़ दिया करते थे तो कभी मिट्टी खाया करते थे; पर उनकी हर शरारत भी प्यारी लगती थी, गोपिया उनकी शिकायत तो किया करती थी पर साथ ही अपने घरों के दरवाज़े भी नन्दलाला के लिए खुला छोड़ दिया करती थी. इससे पता चलता है कि जब दिल साफ़ होता है तब हर गलती भी छोटी होती है. कृष्ण ने अपने बाल्यकाल में ही कई दानवो और बुरे लोगो का विनाश करा था और हमे ये सिखाया था कि विप्पत्ति चाहे कितनी भी बड़ी हो पर मन की हिम्मत से हर कठिन राह भी आसान हो जाती है. आज दोस्ती की परिभाषा बदल गयी है – फेसबुक, इन्टरनेट की बनावटी दुनिया में सखा साथी कही खो से गए है और दोस्ती में स्वार्थ, अहम् इतना बढ़ गया है कि कृष्ण-सुदामा जैसी दोस्ती जाने कहा खो गई है. अपने परिवार और नगरवासियों की मदद के लिए हमेशा तत्पर रहना, सभी का आदर सम्मान करना, हमेशा अपने हँसमुख स्वाभाव से सबको खुश रखना, आदि कई गुण थे कान्हा में. कलियुग की तथाकथित “Personality Development Classes ” से कई गुना ज्यादा सिखाता है कान्हा जी का जीवन….. जरुरत है तो बस उन्हें मन में बसाने की और उनके रंगों में रंग जाने की…

सेक्टर 11 शिव मंदिर में भी कन्हैया का जन्मोत्सव धूम धाम से मनाया गया. बाल गोपाल की झांकी बनायीं गयी, 20 सालों से चली आ रही परंपरा के अनुसार भजन संध्या का आयोजन भी  किया गया जिसमे सभापति रजनी डांगी और प्रमोद सामर ने कार्यक्रम का आनंद  लिया.

Shiv_Mandir_Triyambakeshwar_Mahadev_Udaipur_Janmashtmi_2012

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Photos By : Yash Sharma
उदयपुरब्लॉग(UdaipurBlog.com) की ओर से सभी को जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाए…!!! जय श्री कृष्णा..!!! 🙂

 

Some More Photos by Chirag Mehta

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जय श्री कृष्णा..!!!

मेरे सपनो की बारिश, कब आओगी तुम ??

clouds in udaipur

वर्षा ऋतू हमें गहराई तक छूती है. सावन में सिर्फ तन ही नहीं भीगता, अंदर तक भिगो जाती है बरखा की बूंदें… सावन की रिम झिम फुहारों के बीच उगते अंकुरों, हरे होते पहाड़ों और, और ज्यादा गहराई तक नीली होती झीलों के बीच हमारा मन “किसी की चाह” हेतु व्याकुल हो उठता है.

पर इस बार चाह किसी और की नहीं, बल्कि बारिश की ही है. ये आये तो किसी और को याद करने का मौक़ा मिले ना ! हरियाली अमावस पर, सोचा कि शहर के कमीनेपन से दूर जब गांव के निर्मल मन फतहसागर और सहेलियों की बाड़ी आयेंगे तो इंद्र को मजबूर होना ही पड़ेगा… पर इस बार भी हमेशा की तरह मेरा अनुमान गलत निकला ! उनकी पुपाडी की आवाज़ मेघों तक नहीं पहुंची. उनका सजना सवरना व्यर्थ गया…!!

 

“सावन आयो रे, ओ जी म्हारा, परणी जोड़ी रा भरतार,

बलम प्यारा, सावन आयो रे…”

 

सावन तो आयो पण बरखा कोनी आई .. परणी जोड़ी का भरतार, अब तुझे कैसे पुकारें..!! कालिदास ने मेघदूत ग्रन्थ में अपना संदेसा पहुँचाने के लिए बादलों को जरिया बनाया था.. वे जाकर प्रेमिका पर बरसते थे.. यहाँ तो सबकुछ सूखा- सूखा… कैसे भीगेगा प्रेमिका का तन- मन… क्या जुगत बिठाये अब ??

बचपन के दिन याद आते है. मुझे बचपन में अपनी भुआजी के यहाँ गांव में रहने का खूब मौका मिला. बारिश में भीगते भीगते खूब जामुन खाते थे. पेड पर चढ़ने की भी ज़रूरत नहीं होती थी, खुद-ब-खुद जामुन बारिश की मार से ज़मीं पर आ गिरते थे. मक्की की बुवाई होती थी… गीली मूंगफली को खेतों की पाल पर ही सेक कर खाते थे. भुट्टे का मज़ा, मालपुए की ठसक…क्या क्या आनंद होते थे. कच्ची झोपडी के केलुओं से बारिश की झर झर गिरती धार… और उस पर गरमा गरम राब… भुआ तवे पर चिलडे बनाती थी..आटे का घोल जब गरम गरम तवे पर गिरता था तो एक सौंधी महक मन में बस जाती थी. गांव के लोग इकठ्ठा होकर एक जगह सामूहिक प्रसादी करते थे. तेग के तेग भरकर खीर बनती थी और बनती थी बाटियां … आज बस उनकी यादें शेष है. आज 260 रुपये किलो वाले मालपुए लाकर खा लेते है, और खुश हो लेते है.. पर उसमे माटी की वो सौंधी खुशबु नहीं होती.

खैर अब अपन शहर में रहते है. कार की खिडकी खोलकर बारिश में हाथ भिगोने का मज़ा हो या बाइक लेकर फतहसागर पर चक्कर लगाने का मौका… हमें सब चाहिए, पर निगोडी बारिश पता नहीं किस जनम का बदला ले रही है.. उमस ने जीना मुहाल कर रखा है. खाली फतहसागर पर मन नहीं लगता. पिछोला में देवास का पानी आने की क्षणिक खुशी हुई ही थी कि लो जी वहाँ भी चक्कर पड़ गया. अब तो बस श्रीनाथजी का ही आसरा है. क्योंकि बारिश नहीं हुई तो उनका नौका विहार कैसे होगा. लालन लालबाग कैसे जायेंगे, बंशी कैसे बजेगी, गायें क्या खायेगी…! हम तो जैसे जैसे दो दिन में एक बार आ रहे नल के पानी से काम चला लेंगे किन्तु अगर बारिश नहीं आई तो बेचारे ये निरीह पशु क्या खायेंगे ? गलती इंसान की और भुगते सारे जीव-जंतु..!!! मन बस बार बार अपने   को निर्दोष पाते हुए अपील कर रहा है …
काले मेघा काले मेघा, पानी तो बरसाओ….

Photo by : Mujtaba R.G.

फतह सागर: कहाँ से आये इतने मछ्छर!

आप में से कई लोगों ने पिछले कुछ दिनों से फतह सागर की पाल पर गाड़ी चलाते वक़्त मछ्छरों को खुदसे टकराता हुआ पाया होगा. ये झुण्ड कभी चालक की आँखों तो कभी मुँह में चले जाते हैं जिससे यहाँ दिनभर की थकान मिटाने के लिए आने वाले उदयपुरवासियों को और इस विश्व प्रसिद्ध झील की खूबसूरती निहारने पहुँचे पर्यटकों को काफी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है.

 Fatehsagar_Lake_Udaipur_Dirty_Pictures

 

जब हमने इसका कारण जानना चाहा तो पाया की झील के पानी में कई जगह गन्दगी का अम्बार लगा हुआ है जिसकी सफाई की सुध लेने वाला कोई नहीं है. यही गंदगी इन मछ्छरों के पनपने और पोषित होने का स्थान बनी हुई है. एक और जहां पुलिस पाल किनारे पार्किंग और झील किनारे गन्दगी को रोकने के लिए पूरा अभियान चला चुकी है और आये दिनवाटर स्पोर्ट्स को विकसित करने के नए-नए तरीके सुझाये जा रहे हैं; उसी दौरान प्रशासन की इतनी लापरवाही ना सिर्फ उदयपुरवासियों को परेशान कर रही है बल्कि बाहर से आने वाले पर्यटकों को भी गलत सन्देश देकर लौटा रही है.
हरे-भरे पहाडों के बीच फव्वारों और उद्यानों से सुसृजित झील के अति सौन्दर्यपूर्ण रूप में किनारों पर ऐसी गन्दगी आगंतुकों को कुछ खटकती नहीं है.
हम संपूर्ण उदयपुर की तरफ से निवेदन करते हैं की ये कार्य चाहे जिस किसी भी विभाग के अंतर्गत हो, वे जनहित में शीघ्र से शीघ्र झील की सफाई की और ध्यान दे. हम नहीं चाहेंगे की राष्ट्रीय मीडिया में हमारे सुन्दर शहर के पर्यटन गढ़ की देश के समक्ष ऐसी बात को लेकर कोई आलोचना हो.

 फोटो एवं विडियो: यश शर्मा