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Five Festivals of Jaipur That Add To the Vibrancy of the Pink City

Popularly known as the Pink city, Jaipur is known for its colors and vibrancy. It remains on top of the list of tourist destinations in India mainly because of its enigmatic and beautiful heritage. The people of Jaipur are enthusiastic and lively, bringing the city to life by celebrations of various festivals all year long. During these festivals, all the establishments in this city—from roadside dhabas to 5-star hotels in the Pink City, the likes of The Lalit—have schemes and deals in celebration of the festivities.

The state Rajasthan has myriad forms of folk entertainment, traditions, and customs, which vary from one region to the next. This makes it diverse and united at the same time. The one thing that keeps people together despite their varying traditions is the fact that they do it together, with joy and a keen interest to keep the age-old traditions afloat in this contemporary world. As festivals are the perfect way to enhance the bonds between people with different roots, the various festivals celebrated in Jaipur help people from different regions, caste and creed come together and appreciate each other.

Here are some famous festivals celebrated with immense glory and merriment in the Pink City:

 

  • Elephant Festival

Celebrated in the month of February and March, the Elephant Festival is held on the full moon day of ‘Phalgun Purnima’. The highlights of this interesting festival are the elephant polo and elephant dances that are truly grand and mesmerizing. There are processions of bedecked elephants that are dressed in vibrant colors, bright saddle cloth, jewelry, etc. Colored powder or ‘gulaal’ is also sprinkled on these glorious elephants. These processions are truly a sight to behold. Along with this tradition, there are other activities as well, like a tug-o-war between the elephants and the people.

Credits: Shutterstock

 

  • Teej

An important festival in many parts of the country, Teej involves women dressing up in beautiful outfits and jewelry and applying henna on their hands. People gather in temples and Goddess Parvati is worshipped. Many folk dances, traditional songs, and fun-filled activities are also organized.

 

  • Jaipur Literary Festival

A personal favorite, this exquisite and educative festival is held in January for five days every year. Started in 2006, it has now become the largest literary festival in the Asia Pacific. People from around the world come to Jaipur to attend this festival. National, as well as foreign authors, grace this festival with their presence and many discussions on relevant issues,  are held. Along with sessions, there is a wide range of handicrafts and food items in the festival, along with performances by local bands in the evening. Many good restaurants in Jaipur have their stalls in this festival, giving rise to a mela-like atmosphere abound with food, books, and enlightening conversations.

 

  • Kite Festival

Held on 14 January, this festival is responsible for the colorful sky that Jaipur witnesses on this day. The view is breathtaking as towards dusk, the sky is full of millions of kites, lamps, and fireworks. Many kite-flying competitions also take place on this day, and it is worth visiting Jaipur during this festival. This unique festival marks the transition of the sun from Sagittarius to Capricorn.

Credits: India.com

 

  • Gangaur Festival

Known for its colors and vibrancy, Gangaur is an important festival of Rajasthan. It is celebrated from March to April. Lord Shiva and Goddess Gauri are worshipped during this festival and it is marked by the carving of magnificent clay idols of the gods and goddesses. Multiple hues can be witnessed during this occasion in which women pray for the long lives of their husbands.

A city is not just defined by its infrastructure and roads, it is also identified by the cultures and traditions its people follow, and what better way to gauge the ethos of the people than the festivals they observe and celebrate?

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आज है हरियाली तीज | जानिए इस त्यौहार के बारे में

आज हरियाली तीज के मौके पर हम आपको इसी के कुछ पहलुओं से अवगत करवाने वाले है। हरियाली तीज का त्यौहार प्रतिवर्ष श्रावण के महीने की शुरुवात में मनाया जाता। देवी पार्वती को समर्पित, तीज का त्यौहार देवी पार्वती और भगवान शिव के मिलन की स्मृति में मनाया जाता है। सावन का महीना और भगवान शिव और देवी पार्वती का पवित्र रिवायत इस त्यौहार का आधार है।

 

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                            हरियाली तीज का इतिहास


हरियाली तीज का त्यौहार देवी पार्वती का भगवान शिव के प्रति अनंत निष्ठा व प्रेम का प्रतीक है। इस दिन भगवान शिव और देवी पार्वती, हज़ारों सालों के बाद, फिर से, एक हो गए थे। इस त्यौहार के रीति- रिवाज और परंपरा भी प्रेम और निष्ठा के अद्भुत संगम का आधार है। इसका का कुछ विवरण मेवाड़ के इतिहास की प्रसिद्ध किताब, महामहोपाध्याय कविराज श्यामलदास (महाराणा सज्जन सिंह जी के आश्रित कवि) द्वारा रचित  “वीर विनोद” में भी मिल जाता है। किताब का अंश कुछ इस प्रकार है-

“श्रावण शुक्ल 3 को तीज का त्यौहार मनाया जाता है। इस त्यौहार को राजपूताना में राजा व प्रजा सब मानते है, और महाराणा जगनिवास महल में पधार कर गोठ जीमते है और रंगीन रस्सों के झूलो पर औरते झूलती और गायन करती है। शाम के वक़्त महाराणा जुलुस के साथ नाव सवार हो कर राग रंग के किनारे पर पहुंचते है। यदि इच्छा हो तो वह से हाथी या घोड़े पर सवार हो कर सीधे महलो में पधार जाते है। पश्चात, जगनिवास महल और बाड़ी महल में वैसी ही तैयारियाँ होती है जैसी गणगौर के उत्सव में बयान की गयी है।”

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                                हरियाली तीज का महत्व


सावन का महीना त्यौहार मनाने योग्य ही तो है क्योंकि वर्षा का आगमन जो होता है भूमि पर। इस दिन, सभी वर्ग की औरते लहरिए-बांधनी साड़ी पहने, गेहेनो और मेहँदी से सज कर देवी पार्वती के दर्शन हेतु जाती है और बाघों में झूले लगाए जाते है।  “सावन के झूले” का प्रसंग काफी प्रसिद्ध है। तीज का त्यौहार झूलो के बिना अधूरा सा लगता है और इनकी सजावट भी कुछ राजस्थानी ढंग से की जाती है। चमकीले लाल-पीले-हरे रंग के घाघरा- चोली पहने सभी विवाहित महिलाएँ इन झूलो का आनंद लेती है और साथ ही साथ देवी पार्वती की भक्ति से सराबोर लोक गीत गाती है इसी आशा में की देवी पार्वती सदैव उन पर अपनी कृपा बनाए रखेंगी। सावन के गीत गाने की परंपरा भी काफी प्रचलित है। मेहँदी भी काफी प्रचलित और मान्य परंपराओं में से एक है। मेहँदी और चूडियो से सजे हाथ, तीज के पर्व की शोभा में चार चाँद लगा देते है।तीज के त्यौहार पर घेवर का राजस्थान में एक अलग महत्व है। यह पारंपरिक मिठाई मैदा, चीनी और अलग-अलग ड्राई फ्रूट्स सब मिलकर बनी होती है साथ ही साथ इसके ऊपर केसर का छितराव और चाँदी का वर्क चढ़ा होता है। इस मिठाई की आपको दस के आस-पास वैरायटी देखने को मिल जाएगी जिनमें केसर घेवर, पनीर घेवर, मलाई घेवर बहुत प्रसिद्ध  है। मिठाई पर घी की मोटी परत होने के बावजूद यह खाने में बेहद सुपाच्य मानी जाती है। तीज पर घेवर को शादीशुदा लड़की को देने का भी परंपरा है। सावन मैं घेवर बनाना उत्तम क्यों रहता है, इसके पीछे कारण यह है की यह सावन की नमी भरे वातावरण को पूर्ण रूप से सोख लेता है जिससे इसका स्वाद बना रहता है। ऐसा माना जाता है कि यह मिठाई वाजिद अली शाह द्वारा जयपुर लाई गई थी। इतने सालों के बाद आज भी घेवर राजस्थान के कई भागों में मिल जाता है।

 

सावन, हरियाली, लहेरिये, झूले, मेहँदी, घेवर, मालपुए यह सभी इस पर्व के पर्याय है और संस्कृति व श्रद्धा से परिपूर्ण यह पर्व आज भी उसी हर्षोउल्लास से मनाया जाता है और आशा यही है की इसकी गरिमा सदैव यूही बनी रहे।