‘Honor Killing’ जैसे गम्भीर विषय को नाटक “पुकार” के रूप में दिखाया, शिल्पग्राम की रंगशाला में!

हम ज़िन्दगी में जो भी काम करते हैं उसका फल देर-सवेर हमें मिल ही जाता है।  धर्मराज युधिष्ठिर ने सम्पूर्ण जीवन धर्म और सत्य की रक्षा को समर्पित किया, लेकिन जीवन में सिर्फ़ एक बार, एक अर्धसत्य की वजह से उन्हें भी यह दृश्य (जो कि काल्पनिक रूप में था) दिखाया गया कि उनका परिवार नर्क की निर्मम यातना से गुज़र रहा है। मतलब ज़िन्दगी में चाहे कितने ही अच्छे काम किये हों, लेकिन यदि एक भी बुरा काम किया है तो उसका नतीजा भी हमारे खाते में अवश्य आयेगा। कुछ ऐसा ही हुआ एक गाँव के सरपंच ‘नानका’ के साथ! कहाँ? कब? कैसे? इन सब सवालों का जवाब मिला 7 दिसम्बर, रविवार को, पश्चिम क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र द्वारा आयोजित मासिक नाट्य संध्या “रंगशाला” के तहत, जयपुर के कलाकारों द्वारा मंचित नाटक “पुकार” में!‘Honor Killing’ जैसे गम्भीर विषय को नाटक "पुकार" के रूप में दिखाया, शिल्पग्राम की रंगशाला में!

यह नाटक, राजस्थान की लोक नाट्य शैली- “तमाशा” से प्रेरित है। विशेष तौर पर गीतमय, एवं तुकबंदियों वाले कवितामय संवादों के साथ, मंच पर उपस्थित कलाकारों ने उम्दा अभिनय से प्रस्तुति को सशक्त बनाया। नाटक में मुख्य रूप से “सम्मान के लिये हत्या” (Honor Killing) जैसे गम्भीर और ज्वलन्त विषय को, गहरे और सार्थक कटाक्ष के माध्यम से रेखांकित किया गया, कि किस तरह लोग इज़्ज़त और मर्यादा के नाम पर किसी निर्दोष की साँसें रोकने को राष्ट्रभक्ति समझते हैं। बीच-बीच में दर्शकों को हँसाने, गुदगुदाने के साथ ही समाज की विभिन्न बुराईयों पर गहराई से सोचने पर विवश कर दिया।‘Honor Killing’ जैसे गम्भीर विषय को नाटक "पुकार" के रूप में दिखाया, शिल्पग्राम की रंगशाला में!

नाटक का कथानक कुछ ऐसा है कि एक गाँव का सरपंच, जिसका नाम “नानका” है वह अपने विवाह पर अपनी पत्नी “धानका” को वचन देता है, कि वह हमेशा सत्य का साथ देगा, कभी किसी निर्दोष के साथ अन्याय नहीं होने देगा, और हमेशा गाँव की भलाई के लिये ही कार्य करेगा। कुछ वक़्त बाद धानका अचानक विक्षिप्त/पाग़ल हो जाती है। तब उसे ठीक करने के लिये एक ओझा को बुलाया जाता है। ओझा कहता है, कि धानका की इस हालत का ज़िम्मेदार ख़ुद सरपंच ही है! सरपंच ने कोई ग़लत काम किया है जिसकी वजह से धानका पर ईश्वर का प्रकोप टूटा और वह पाग़ल हो गयी, लेकिन लोग नहीं मानते कि उनके गाँव का रखवाला कुछ बुरा भी कर सकता है। तब ओझा सरपंच से अतीत में उसके द्वारा किये गये कार्यों के बारे में पूछता है, तो एक-एक करके सरपंच बताता है कि कैसे उसने एक विधवा को नयी ज़िन्दगी देने के लिये उसका पुनर्विवाह कराया, दो अबोध बच्चों का विवाह रुकवाया, एक विधवा को नाता प्रथा के तहत अपने ही देवर से ज़बर्दस्ती विवाह के बंधन में बंधने से बचाया! तब ओझा कहता है कि सारे अच्छे कामों के बारे में तो बता दिया, लेकिन जो बुरा किया है उसका क्या??

‘Honor Killing’ जैसे गम्भीर विषय को नाटक "पुकार" के रूप में दिखाया, शिल्पग्राम की रंगशाला में!
तब आख़िरकार सरपंच बताता है, कि एक बार गाँव के एक युवक-युवती ने प्रेम विवाह किया, तो उनके परिवार वाले बहुत ज़्यादा क्रोधित हो गये, कि इन दोनों ने हमारी इज़्ज़त धूल में मिला दी, इन्हें फाँसी की सज़ा दो, जलती हुई भट्टी में झोंक दो। तो सरपंच उस प्रेमी जोड़े को समुदाय और गाँव से बेदख़ल करने की सज़ा सुनाकर उन्हें बचा लेता है। लेकिन यह फ़ैसला उनके परिवारों को स्वीकार नहीं होता, और प्रतिशोध की आग में अंधे होकर वे लोग उन दोनों की हत्या कर पेड़ से लटका देते हैं। –“यह पूरी घटना सरपंच देख रहा होता है, पर ना तो वह उन लोगों को रोकता है, और ना ही किसी अन्य व्यक्ति को इस बारे में बताता है।”–
इस तरह जब सरपंच सबके सामने अपने द्वारा इस एकमात्र ग़लत कार्य का हो जाना स्वीकार करता है, तब होता है एक चमत्कार- धानका पहले की तरह ठीक हो जाती है।‘Honor Killing’ जैसे गम्भीर विषय को नाटक "पुकार" के रूप में दिखाया, शिल्पग्राम की रंगशाला में!

1. जो कलाकार मंच पर रहे- विशाल भट्ट, अन्नपूर्णा शर्मा, अखिल चौधरी, आशुतोष पारीक, तपन भट्ट, शिवेन्द्र शर्मा, रिमझिम, संवाद भट्ट, विष्णु सेन, साक्षात दवे, झिलमिल, मुकेश कुशवाहा, नवीन टेलर, गौरव मीणा, और अभिषेक शर्मा।
2. पर्दे के पीछे वाले जादूगर-
संगीत संचालन- अनुज भट्ट, शैलेन्द्र शर्मा (जिन्होंने तबला, हार्मोनियम, और झाँझ के साथ नाटक में संगीत घोला)

प्रकाश व्यवस्था- शहज़ोर अली (जिन्होंने विभिन्न रंगों के उजाले लेकर, नाटक के दृश्यों, और क़िरदारों के जज़्बातों को और प्रभावी बनाया)

लेखक- तपन भट्ट (जिन्होंने सरल, सार्थक शब्दों के प्रयोग से संवादों को सशक्त और प्रभावी बनाकर इस नाटक को दो दिन में ही निपटा दिया)

निर्देशक- सौरभ भट्ट(जिन्होंने अपनी कल्पना को, बाक़ी सब कलाकारों की कल्पना के साथ विवाह के सूत्र में पिरो दिया)

‘Honor Killing’ जैसे गम्भीर विषय को नाटक "पुकार" के रूप में दिखाया, शिल्पग्राम की रंगशाला में!कुछ ख़ास बातें-

– नाटक में दृश्य परिवर्तन, एवं पूर्व समय (FlashBack) के दृश्यों को दिखाते समय, किसी भी प्रकार के फ़ेड-आउट (मंच पर कुछ पल का अंधेरा, और फिर उजाला) का प्रयोग नहीं किया गया, जिसने निरंतर रूप से दर्शकों को नाटक से जोड़े रखा।‘Honor Killing’ जैसे गम्भीर विषय को नाटक "पुकार" के रूप में दिखाया, शिल्पग्राम की रंगशाला में!

– जब गाँव वाले एक विधवा की दूसरी शादी करने को तैयार नहीं होते, कि इसे जीवन भर अपने पति की याद में अकेले ही रहना होगा, तब सरपंच का यह कहकर विरोध करना, कि अभी तो इसके सामने पूरी ज़िन्दगी पड़ी है, जिसे ख़ुशियों और उम्मीद के रंगों से भरना ही हमारा कर्तव्य है।

– प्रेमी युगल के विवाह के दृश्य में, पण्डित जी द्वारा अपना चश्मा घर पर ही भूल जाने से उत्पन्न परिस्थितियों में, दर्शक हँस-हँस कर लोट-पोट हो जाते हैं।‘Honor Killing’ जैसे गम्भीर विषय को नाटक "पुकार" के रूप में दिखाया, शिल्पग्राम की रंगशाला में!

– बाल विवाह के दृश्य में भी दोनों बच्चे, अपने नटखटपन से पंडित जी की नाक में दम कर देते हैं, और दर्शकों को एक और मौक़ा मिल जाता है ठहाके लगाने का! इसी बीच सरपंच का यह विवाह रुकवाना, परिवार के विरोध का कारण बन जाता है। जब उन दोनों बच्चों से पूछते हैं कि “शादी का मतलब” क्या होता है बताओ? तब बच्चे “बैण्ड-बाजा” और “गुलाब-जामुन” का नाम लेते हैं। यहाँ उन बच्चों की मासूमियत हमें सोचने पर मजबूर कर देती है, कि जिनके लिये ज़िन्दगी अभी मौज-मस्ती, और खिलौनों से ज़्यादा कुछ नहीं, जिन्हें अपने अच्छे-बुरे की समझ नहीं, जिन्हें “विवाह” शब्द का अर्थ तक पता नहीं, वे इतनी बड़ी ज़िम्मेदारी को कैसे निभायेंगे!! उन अबोध बच्चों से उनका बचपन छीन कर, उनके सपनों के अंकुर कुचलकर, उनके वर्तमान और भविष्य का गला घोंटना सर्वथा अनुचित और अन्यायपूर्ण है।‘Honor Killing’ जैसे गम्भीर विषय को नाटक "पुकार" के रूप में दिखाया, शिल्पग्राम की रंगशाला में!

नाता प्रथा- (वह प्रथा जिसमें परिवार की बहू को उसके पति की मृत्यु के बाद, पति के ही बड़े या छोटे भाई से विवाह करने के लिये बाध्य किया जाता है) के दृश्य में विधवा स्त्री को अपने से कई वर्ष छोटे, अपने देवर से विवाह करने हेतु मजबूर किया जाता है, लेकिन वह कहती है कि मैंने जिसे  पुत्र की तरह स्नेह किया है, उसे कैसे अपना पति स्वीकार करूँ? वह बालक भी अपनी भाभी को अपनी माँ समान ही मानता है, और सरपंच भी इनके साथ हैं। संदेश यही है कि एक स्त्री भी एक इंसान है, उसे भी वे सब अधिकार प्राप्त हैं जो बाक़ी सब इंसानों को प्राप्त हैं, और उन्हीं अधिकारों में से एक है “स्वतंत्रता का अधिकार”! अपनी इच्छानुरूप कपड़े पहनने की स्वतंत्रता, कहीं आने-जाने की, या जीवनसाथी चुनने की। वह कोई जानवर नहीं है जिसे बिना उसकी मर्ज़ी के किसी भी खूँटे से ज़बर्दस्ती बाँध दिया जाये।

अब “मन की बात” (हाँ, कभी-कभी हम भी कर लेते हैं, जब आप जैसे प्यारे पाठक मिलते हैं)–
1. हम बड़ों को एक छोटा सा helmet भी बोझ लगता है, तो छोटे बच्चों पर बड़ी ज़िम्मेदारियों का बोझ डालना सही है क्या? नहीं है ना? हाँ! इसलिये “नो बाल विवाह!!”
2. “भारत मेरा देश है!
समस्त भारतीय मेरे “भाई-बहन” हैं!” विद्यालय के दिनों की इस प्रतिज्ञा की “दूसरी पंक्ति” को कुछ ज़्यादा ही गम्भीरता से लेने वाले समाज के सम्मान के, परिवार की प्रतिष्ठा के, तथाकथित रक्षकों के लिये एक महत्वपूर्ण सूचना—
जितनी प्रेम, स्नेह, सुरक्षा, की भावना और शक्ति “रक्षासूत्र” में है, उतनी ही “मंगलसूत्र” में भी है!‘Honor Killing’ जैसे गम्भीर विषय को नाटक "पुकार" के रूप में दिखाया, शिल्पग्राम की रंगशाला में!

अन्त में कुछ अल्फ़ाज़-
जब वसुधा की आँखों में आँसू, होंठों पर धिक्कार हो,
उस वक़्त शायद वक़्त भी, ख़ुद को कोसे, शर्मसार हो,
खोखले सम्मान की ख़ातिर बहा कर ख़ून जब
इन्सां मनाये जीत, पर इंसानियत की हार हो…

Shilpgram Utsav: An Alluring Summation of Indian Handicrafts Ends with a Promise to Come Next Year

Shilpgram Utsav In Udaipur • December 21 to 30 December 2017

All roads led to Shilpgram, craftsmen’s village, a huge ethnographical museum that comprises over 31 rural dwellings from the four-member Western States of India viz Goa, Gujarat, Maharashtra and Rajasthan, re-erected in 70 acres of picturesque countryside amongst the foothills of the Aravalli range, just 5 km west of Udaipur. The ten-day long Shilpgram Utsav in which 600 folk artist from 18 states and 400 artisans participate was inaugurated on Dec. 21st by Rajasthan Governor Kalyan Singh.

According to Mohd.Furqan Khan Director West Zone Cultural Centre Udaipur, the annual festival was organized with the aim of displaying the handicrafts of craftsmen from all over the country and marketing their products directly without any middlemen.The Shilpgram Utsav was staged with the cooperation and contribution of the seven zonal cultural centers, the ministry of Culture Govt. of India, Development Commissioner Handicrafts New Delhi, Development Commission Handlooms, New Delhi and National Wool development Board New Delhi and in it over 1000 folk artists participated.Shilpgram Utsav In Udaipur

A new feature introduced this year in the Utsav was the Kamal Kothari Memorial (Life Time Achievement) Lok Kala Award. Dr. Kamal Kothari was born in Jodhpur and educated in Udaipur, devoted his whole life to the preservation of Rajasthan’s folk arts, folk music, and folk music instruments, research in folk arts and their development collection of folk songs and research in all these areas. With Indian’s one of the greatest story writers are Vijaidan Detha he launched Prerna Magazine with the aim of collections, recordings and making a musical notation of folk songs. He worked for Rajasthan Sangeet Natak Academy. It was due to him that Langa Mangniiyar musicians became famous all over the world. He was honored with Padma Shree and Padma Bhushan Awards. He was given Nehru Fellowship for the collection of Rajasthani Literature, folk songs, folk tales etc. The Govt. of Rajasthan honored him with Rajasthan Ratna in 1989 Columbia University, made a documentary named ‘Kamal Da’.Shilpgram Utsav In Udaipur

This year’s Kothari Life Time Achievement Award worth 2.51 Lac was given by Rajasthan Governor on 21st December to folk artist Bansi Lal Khiladi of Chvee village of Degana in Mansaur district, who has acted as Raja in folk plays. He has been a Mand singer and Ramleela player. Looking to his proficiency in Kuchamani Khayal style, his guru Nath Dasji made him the leader of the troupe. He has given thousands of presentations organized by different places. He has been honored by Rajasthan Sangeet Academy and Sangeet Natak Academy, New Delhi. His presentations on the first three days of Shilpgram Utsav were greatly appreciated by the audience.Shilpgram Utsav In Udaipur

One of the main attractions of the Utsav this year was the fusion of three kinds of styles, out of which the fusion of two classical and one semi-classical style was presented in place of that mixings of one ‘raga’ and ‘tal’ of two different styles. In this special presentation were added Lavni of Maharashtra, Gotipua of Orissa and classical Kathak. In this Lavni exhibited classical element with folk element while Gotipua was a fascination of classical elements that was mesmerizing. Kathak was a mix of beautiful step work and facial expressions. There was a similarity of musical instruments; the three styles produced a highly enjoyable effect.

Shilpgram Utsav In Udaipur
Performances in the Shilpgram Utsav In Udaipur

The exhibition of wood statues prepared by artists from different parts of the country during a wood sculpture workshop organized earlier turned out to be another big attraction. Also on display in the Darpan hall were different paintings by well-known painters from all over the country painted in a workshop organized by the Centre from time to time.

For the first time in Utsav were on display the different characters such as Devi Amba, Raee, Budiya, Banjara, Chor-police, Bhiyawa of Gavari; made of sand. Gavari is a folk festival of the Bhil caste of Mewar that is min. Of dance, music, and actions and celebrated enthusiastically in the month of Shrawan.Shilpgram Utsav In Udaipur

Visitors got an exciting opportunity to showcase their talent in the ‘Hiwda Ki Hook’ programme when every afternoon they sang, danced and related their interesting experiences before a big audience. They were also able to win prizes in the Sanskritik Quiz.

For their own use and giving gifts, visitors were seen busy buying different handicrafts products from Andhra Pradesh, Arunachal Pradesh, Assam, Bihar, Delhi, Gujarat, Himachal Pradesh, Haryana, Karnataka, Kerala, Maharashtra, Jammu and Kashmir, Madhya Pradesh, Orissa, Punjab, Rajasthan, Uttar Pradesh, Uttrakhand, Bengal, Goa etc.Shilpgram Utsav In Udaipur

The crowds swelled during the last few days as they were able to get products they liked at a much lower price. Young and old were seen riding camels and horses with the huge variety of cuisine foodies had a whale of a time. A large number of tourists, both inland and foreign, also enjoyed themselves immensely.Shilpgram Utsav In Udaipur

With better marketing, this big Mela can easily become an even bigger national level Mela that would also boost tourism.

Photo Credits: Dimpy Chundawat & Fouzia Mirza

जाणो, आपणे राजस्थान रा संगीत ने!

Update Yourself with the Music of Rajasthan

Dancing to the beats of international artists, we enjoy a lot. And why not! The beats are electric and so energetic that it compels us to dance and we get carried away. I am sure everyone reading this would agree with my opinion. But sometimes, we need a more subtle music which is away from the hustle and takes us back to our roots, takes us back to the very foundation- that ties us to our birthplace. In the same way, a lot of people prefer listening to folk music, whether they belong to any place; they crave for raw voices, ‘desi’ instruments, and vernacular dances and music.

Everyone has a different taste in music, but when it comes to folk music- we enjoy it hands down.

The music of Langa and Manganiyar of Rajasthan

Know the music of Rajasthan: Langa and Manganiyar  
Mangniyar Musicians

Who are Langa and Manganiyar?

Langa and Manganiyar are folk musicians who follow a rich oral tradition which they have inherited from their forefathers. These balladeers from Rajasthan sing of everyday chores and emotions. They become highly relatable and probably that is the reason why they are able to mesmerize their listeners.

Manganiyars have expertise over percussion instruments like Dholak and Khadtal, whereas Langas are known for Sarangi, Murali, Surnai, etc. Their musical compositions are masterpieces and are quite complex. The word Manganiyar means those who ask for charity. On different occasions, they would go to patron’s house and sing songs and in turn, would be awarded.

Know the music of Rajasthan: Langa and Manganiyar  
Langa community musicians

If you go through the roots of these musical groups then we come to know that these Langas and Manganiars were groups of professional musicians, whose music was supported by wealthy landlords and aristocrats. This tradition and hierarchy are maintained till now.  Both the groups sing in the same language but their styles differ. This difference of style came into existence as per the tastes of their patrons. Both the communities belong to the Islamic origins but many of their songs are in praise of Hindu deities. Similarly, they are known to celebrate Hindu festivals such as Diwali and Holi. The Manganiar performers evoke the Hindu God Krishna and seek his blessings before the commencement of their music recital.

Know the music of Rajasthan: Langa and Manganiyar  
Khartal- a music instrument majorly used by both the communities of musicians

It is also believed that the Manganiars were musicians of the Rajput courts. They used to accompany their chiefs to war and providing them with entertainment before and after the battles. In addition to this, these singers and musicians also performed at the event of the chiefs’ death and would perform at the ruler’s vigil day and night until the mourning was over.

Coming to the second music community of Rajasthan, the Langas which literally means a song giver is a group of poets, singers, and musicians from the Barmer district of Rajasthan. The Langas are versatile players of the Sindhi Sarangi and the Algoza (double flute), which accompany their magical voices. They used to perform at events like births, and weddings, exclusively for their patrons, who were cattle breeders, farmers, and landowners.

Know the music of Rajasthan: Langa and Manganiyar  
Langa community musicians

Today, these musical groups perform in various realms and acquire major acclamations not just in the country but also internationally. Rajasthan hosts one of the most energetic and redolent music cultures of the world. The land of sand dunes and camels imparts the fragrance of vernacular music and folklores that touches the hearts of many. These musicians have such an impact on the listeners that they are bound to listen to them again and again.

Know the music of Rajasthan: Langa and Manganiyar  
Mangniyars performing in Shilpgram Udaipur

In Udaipur, you can find these musicians in Shilpgram during the annual Shilpgram Festival quite commonly.

It’s said that music transcends time and space, and indeed it holds true in the case of these folk musicians.

Such is the music of Rajasthan!

If you have ever listened to any Langa or Manganiyar, do let us know your experience in the comment section below.

[Pictures] Shilpgram 2011 – Day 2 – The Maharashtra Day

In the running colors of shilpgram it was Maharashtra to show it’s culture and tradition today. Even being the second day, there was a huge crowd of spectators who were there to see the maharashtrian art forms.

Maharashtra day was celebrated with great excitement and passion. One can hear the crowd shouting “Jai bhawani” and “Jai Shivaji”, and whole environment was coloured in the stream of Marathi madness.

Maharashtra day started with Ganesh Aarti followed by heart sizzling performance of Marathi performers. One can see the glance of Gudipadwa, Gokul Ashtami and Ganpati Utsaav in the performances, but the art form of the people of sangli snatched the breath of the audience. The ending was a grand success with combined performance of all Marathi artists.

Dance performances were full of colors and enriched in different art forms of Maharashtra, and were choreographed by Kavita Koli, a veteran in this profession by 25 years. While talking to Kavita koli she said that “My focus is to present the art forms in the best way I can, and the idea is to experiment with new elements to expand its horizon”.

The Maharashtra Day was inaugurated by Director of Cultural Affairs – Ashutosh Ghorpade(Maharashtra),  P. Laliakar.(Goa) and Furqaan Shaikh(Additional Director WZCC)

Shilpgram Day2

Shilpgram Day2

Shilpgram Day2

Shilpgram Day2

Shilpgram Day2

Shilpgram Day2

Shilpgram Day2

Shilpgram Day2

Shilpgram Day2

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Shilpgram Day2

Shilpgram Day2

Shilpgram Day2

Shilpgram Day2

Photos By : Mujtaba R.G.      —       Article By : Priyank Sharma