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देव उत्थापनि एकादशी

dev jhulni ekadashi

dev jhulni ekadashi
विश्व का भरण पोषण करने वाले भगवान् विष्णु वैसे तो क्षण भर का भी विश्राम नहीं करते ,किंतु भारतीय संस्कृति ने देह एवं देव में विभेद न करते हुए समग्र पूजन-अर्चन-वंदन को एक सूत्र में आचरण के लिए निर्देशित किया है-” यथा देहे तथा देवे ” अर्थात जिस प्रकार हम शरीर(देह) का प्रतिदिन स्नान , भोजन , वस्त्राभरण , शयन व जागरण का विधान करते है, उसी प्रकार देवताओं को भी पूजा में स्नानार्थ जल , भोजन हेतु नैवैद्य  (प्रसाद)  एवं वस्त्र-आभरण में श्रृंगार  आदि समर्पित करते है। विष्णु हमारे ह्रदय में निवास करते है ,”हृदये विष्णुं ध्यायते “।

ह्रदय एक क्षण के लिए भी  विश्राम नहीं लेता , किन्तु वैज्ञानिक तथ्य है कि ‘ लुब-डब ‘ की ध्वनि के बीच सैकंड से भी कम समय में ह्रदय विश्राम कर लेता है, कथा है कि –
भाद्रपद मास कि शुक्ल एकादशी को शंखासुर नाम के राक्षस से संग्राम करते हुए विष्णु  भगवान ने उसका वध कर दिया , तदुपरांत अत्यधिक  परिश्रम से हुई थकान दूर करने के लिए विष्णु क्षीर सागर में शयन करने लगे । क्षीर सागर में चार माह तक शयन के उपरांत कार्तिक शुक्ल एकादशी को भगवान विष्णु शयन त्यागकर जागृत हुए । इसी भावना से इस एकादशी को देवोत्थापनी एकादशी या प्रबोधिनी एकादशी से संबोधित किया जाता है । सामाजिक संस्कारो का आज से शुभारंभ हो जाता है।

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विवाह आदि शुभ कार्य प्रारंभ होने लगते है, वस्तुतः ग्रीष्म एवं वर्षा ऋतु में अत्यधिक ऊष्मा एवं जलप्लावन ,  आंधी , तूफ़ान आदि मौसम से होने वाली आपदाएं शांत होने से, क्षीत ऋतु  के आगमन से प्राणियों में उर्जा एवं शक्ति का संचार होने लगता है जिससे हम अपने कार्यों को, कामनाओं को पूरा करने में  तन-मन से सक्षम हो जाते है। नए धान्य की उपज से प्राप्त आर्थिक संसाधन भी हमें प्राप्त हो जाते है , अतः देव प्रबोधिनी के पश्च्यात शुभ कार्यो के लिए मुहूर्त बताये जाते है।

इसी दिन तुलसी विवाह की भी परम्परा मनुष्य जाती की वनस्पतियों के प्रति सजीव भावना की परिचायक है । तुलसी को एक पौधा न मानकर जीवन रक्षक, तथा हमारी रोग-प्रतिरोधक क्षमता को बढाने वाली वनस्पति के रूप  में  देखा  जाता  है।   तुलसी को विष्णु की प्रेयसी के रूप में सम्मानित  कर शालिग्राम स्वरुप से तुलसी विवाह करवाकर अपनी कृतज्ञतामयी भावनाएं समर्पित की जाती है।

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देवाराधन के ये विशिष्ट प्रयोजन परंपरा के रूप में  ऋषियों- मुनियों  ने   समाज की समृद्धि एवं सुखी जीवन के लिए निर्धारित किये हैं जो उत्कृष्ट मानवीय सभ्यता एवं संस्कृति के द्योतक हैं, परिचायक हैं-

          ” सर्वे भवन्तु सुखिनः 
             सर्वे सन्तु निरामयाः”

 

Article By : Dr. Pramod Kumar Sharma

 

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