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photo courtesy: new internationalist

मिसाल: घर से मिलने वाली पॉकेट मनी से ज़रूरतमंद बच्चों की मदद करता है ये कॉलेज ग्रुप ‘सिद्धम्’


‘सिद्धम्’ – एक ऐसा ग्रुप जो हर माह अपनी पॉकेट मनी से ज़रूरतमंद बच्चों के लिए कॉपी, किताब तथा अन्य खाने की सामग्री खरीदते हैं और उसे उन बच्चों में बाँट देते है।

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photo courtesy: world bank

सिद्धम् मिलकर बना है, हर्षवर्धन सिंह चौहान, प्रियांश सिंह, सिद्धार्थ सोनी, अभिजीत सिंह, नरेन्द्र सिंह नरुका, गौरव वर्मा, प्रद्युम्न सिंह और गजेन्द्र सिंह, जैसे लोगो से। चूँकि ये सभी अभी कॉलेज में ही है तो शायद ही किसी की उम्र 22-23 बरस से ऊपर हो! एक और ख़ास बात ये भी है कि ये सभी छात्र राजनीति में भी सक्रिय हैं। इतनी कम उम्र में समाज के उन वर्गों के लिए कुछ कर गुजरने का ज़िम्मा उठाना जो अपनी ज़रूरतों की भरपाई खुद नहीं कर पाते है, अपने आप में ही काबिल-ए-तारीफ़ काम है। ऊपर से छात्र राजनीति में सक्रिय होना भी उन लोगों पर कटाक्ष है, जो हाल ही में छात्रों को राजनीति से दूर रहने की वकालात कर रहे थे।

कैसे काम करते है ये? :- ये सभी मिलकर हर महीने 500-500 रुपये जमा करते है, जो कि अनिवार्य है। उसके बाद ये सभी मेंबर्स अपनी इच्छा से इन 500 रुपयों के आलावा और रुपयें भी डाल सकते हैं। इन रुपयों से ये लोग ग़रीब-बेसहारा, सरकारी स्कूलों, कच्ची बस्ती के बच्चों के साथ-साथ अन्य ज़रुरतमंदों बच्चों में स्टेश्नरी, जूते, खाने की चीज़ें खरीद कर बाँटी जाती है। इस काम को ये पिछले एक साल से कर रहे है।

बच्चों को पढ़ते भी है :- सिद्धम् टीम के मेंबर्स खेल के माध्यम से इन बच्चों को पढ़ते भी है। ढीकली स्कूल से इस काम की शुरुआत की थी। इस दौरान न सिर्फ़ पढाया जाता है बल्कि साफ़ रहना और खेल खेलने के महत्त्व को भी बताते है। इस नए शुरू किए गए प्रोजेक्ट को अब और स्कूलों तक ले जाने की कवायद की जा रही है।

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photo courtesy: new internationalist

क्राउड फंडिंग भी करती है टीम :- सिद्धम्, पॉकेट मनी के अलावा क्राउड फंडिंग का भी सहारा लेती है। इसमें ये लोग शहर के लोगों से अपील करते हैं और उनसे इच्छानुसार राशि लेते हैं। कम से कम ग्यारह रुपयों का डोनेशन आप कर सकते हैं। अच्छी बात ये है कि शहर के कई लोग अब जागरूकता दिखा रहे है और सुखाडिया विश्वविद्यालय में पढने वाले इनके दोस्त तो खैर इनके साथ हैं ही। 🙂

News Courtesy: Rajasthan Patrika

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Shubham Ameta

इंजीनियरिंग से ऊब जाने के हालातों ने लेखक बना दिया। हालांकि लिखना बेहद पहले से पसंद था। लेकिन लेखन आजीविका का साधन बन जाएगा इसकी उम्मीद नहीं थी। UdaipurBlog ने विश्वास दिखाया बाकि मेरा काम आप सभी के सामने है। बोलचाल वाली भाषा में लिखता हूँ ताकि लोग जुड़ाव महसूस करे। रंगमंच से भी जुड़ा हूँ। उर्दू पढ़ना अच्छा लगता है। बाकि खोज चल रही है, जो ताउम्र चलती रहेगी। निन्मछपित सोशल मीडिया पर मिल ही जाऊँगा, वहीं मुलाक़ात करते है फिर।

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