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मेरे सपनो की बारिश, कब आओगी तुम ??

clouds in udaipur

clouds in udaipur

वर्षा ऋतू हमें गहराई तक छूती है. सावन में सिर्फ तन ही नहीं भीगता, अंदर तक भिगो जाती है बरखा की बूंदें… सावन की रिम झिम फुहारों के बीच उगते अंकुरों, हरे होते पहाड़ों और, और ज्यादा गहराई तक नीली होती झीलों के बीच हमारा मन “किसी की चाह” हेतु व्याकुल हो उठता है.

पर इस बार चाह किसी और की नहीं, बल्कि बारिश की ही है. ये आये तो किसी और को याद करने का मौक़ा मिले ना ! हरियाली अमावस पर, सोचा कि शहर के कमीनेपन से दूर जब गांव के निर्मल मन फतहसागर और सहेलियों की बाड़ी आयेंगे तो इंद्र को मजबूर होना ही पड़ेगा… पर इस बार भी हमेशा की तरह मेरा अनुमान गलत निकला ! उनकी पुपाडी की आवाज़ मेघों तक नहीं पहुंची. उनका सजना सवरना व्यर्थ गया…!!

 

“सावन आयो रे, ओ जी म्हारा, परणी जोड़ी रा भरतार,

बलम प्यारा, सावन आयो रे…”

 

सावन तो आयो पण बरखा कोनी आई .. परणी जोड़ी का भरतार, अब तुझे कैसे पुकारें..!! कालिदास ने मेघदूत ग्रन्थ में अपना संदेसा पहुँचाने के लिए बादलों को जरिया बनाया था.. वे जाकर प्रेमिका पर बरसते थे.. यहाँ तो सबकुछ सूखा- सूखा… कैसे भीगेगा प्रेमिका का तन- मन… क्या जुगत बिठाये अब ??

बचपन के दिन याद आते है. मुझे बचपन में अपनी भुआजी के यहाँ गांव में रहने का खूब मौका मिला. बारिश में भीगते भीगते खूब जामुन खाते थे. पेड पर चढ़ने की भी ज़रूरत नहीं होती थी, खुद-ब-खुद जामुन बारिश की मार से ज़मीं पर आ गिरते थे. मक्की की बुवाई होती थी… गीली मूंगफली को खेतों की पाल पर ही सेक कर खाते थे. भुट्टे का मज़ा, मालपुए की ठसक…क्या क्या आनंद होते थे. कच्ची झोपडी के केलुओं से बारिश की झर झर गिरती धार… और उस पर गरमा गरम राब… भुआ तवे पर चिलडे बनाती थी..आटे का घोल जब गरम गरम तवे पर गिरता था तो एक सौंधी महक मन में बस जाती थी. गांव के लोग इकठ्ठा होकर एक जगह सामूहिक प्रसादी करते थे. तेग के तेग भरकर खीर बनती थी और बनती थी बाटियां … आज बस उनकी यादें शेष है. आज 260 रुपये किलो वाले मालपुए लाकर खा लेते है, और खुश हो लेते है.. पर उसमे माटी की वो सौंधी खुशबु नहीं होती.

खैर अब अपन शहर में रहते है. कार की खिडकी खोलकर बारिश में हाथ भिगोने का मज़ा हो या बाइक लेकर फतहसागर पर चक्कर लगाने का मौका… हमें सब चाहिए, पर निगोडी बारिश पता नहीं किस जनम का बदला ले रही है.. उमस ने जीना मुहाल कर रखा है. खाली फतहसागर पर मन नहीं लगता. पिछोला में देवास का पानी आने की क्षणिक खुशी हुई ही थी कि लो जी वहाँ भी चक्कर पड़ गया. अब तो बस श्रीनाथजी का ही आसरा है. क्योंकि बारिश नहीं हुई तो उनका नौका विहार कैसे होगा. लालन लालबाग कैसे जायेंगे, बंशी कैसे बजेगी, गायें क्या खायेगी…! हम तो जैसे जैसे दो दिन में एक बार आ रहे नल के पानी से काम चला लेंगे किन्तु अगर बारिश नहीं आई तो बेचारे ये निरीह पशु क्या खायेंगे ? गलती इंसान की और भुगते सारे जीव-जंतु..!!! मन बस बार बार अपने   को निर्दोष पाते हुए अपील कर रहा है …
काले मेघा काले मेघा, पानी तो बरसाओ….

Photo by : Mujtaba R.G.

About Author

26 yr old guy from Udaipur/Noida currently working in Spiritual Media. He contributes for Media and social service as well. Internet addict, Word Gamer, Part time anchor and full time "Babaji".

1 Comment

  • Kishan Singh Jhala
    September 4, 2012 at 11:35 am

    Hey Prabhu Aap es prathvi ka uddhar barish bhej kar kar rahe ho aap se asha h ki lagatar kripa banaye rakhe

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